अभावों को बेधकर बने देश के श्रेष्ठ धनुर्धर
हौसलाहो तो अभाव बाधा नहीं बनती। झारखंड के गांवों से निकले दो नन्हे धनुर्धरों ने यह सिद्ध कर दिखाया है। दोनों 15 साल के हैं, मगर निशाना अचूक। दोनों तीरंदाजों की उम्र भले कम है, लेकिन उपलब्धियों की फेहरिस्त बड़ी। आर्थिक तंगी के बावजूद सरायकेला-खरसावां जिले के बालीजुड़ी गांव के गोरा हो रांची के जोन्हा गांव की दीप्ति कुमारी जूनियर तीरंदाजी के नेशनल चैंपियन बने हैं। जमशेदपुर में 38वीं जूनियर नेशनल आर्चरी में शुक्रवार को गोरा ने एक गोल्ड, एक सिल्वर एक ब्रांज मेडल हासिल किया ताे दीप्ति ने दो गोल्ड और दो सिल्वर पर निशाना साधकर उपलब्धियों की फेहरिस्त और लंबी की। दोनाें ने साल 2013 में धनुष थामा था और दो साल में कई प्रतियोगिताएं अपने नाम की। इस छोटी अवधि में बांस के धनुष से गोरा 18 दीप्ति 7 गोल्ड मेडल जीत चुकी है। इन्हीं उपलब्धियों के कारण सरायकेला के अर्जुन (गोरा) को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 14 नवंबर 2015 को राष्ट्रपति भवन में नेशनल चाइल्ड अवाॅर्ड फॉर एक्ससेप्सनल एचीवमेंट से सम्मानित किया था।
सपना : ओलिंपिकपदक जीतना
सपना : देशके लिए मेडल जीतना
ब्रांज
08
सिल्वर
04
सिल्वर
08
गोल्ड
07
गोल्ड
18
अबतक कुल पदक
अबतक कुल पदक
रांची से 35 किमी दूर जोन्हा फॉल के पास है जोन्हा गांव। यहीं की रहनेवाली है दीप्ति कुमारी। जोन्हा प्रोजेक्ट स्कूल में नौवीं की छात्रा दीप्ति के जज्बे ने उसे पहली बार में ही तीरंदाजी का जूनियर चैंपियन बना दिया। पिता काईनाथ महतो गाड़ी चलाकर परिवार चलाते हैं। वे दीप्ति को विश्वस्तरीय धनुर्धर बनाना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक तंगी से मजबूर हैं। उनकी लाडली मजबूरी समझती है। इसलिए वर्ष 2013 में उसने धनुष थामा तो पीछे मुड़कर नहीं देखा।
गोरा के पिता खाइरु हो लकवाग्रस्त हैं मां दिहाड़ी मजदूर। तीन बड़े भाई मजदूरी करते हैं। लेकिन, पूरे परिवार का सपना है गोरा को अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज बनाना। बकौल गोरा, घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। धनुष खरीदने के लिए पैसे नहीं है। दीपिका दीदी (तीरंदाज दीपिका कुमारी) मंगल भैया (मंगल सिंह चांपिया) की तरह रिकर्व धनुष मिलेगा, तब कमाल देखिएगा। यह लाखों में मिलता है। इसलिए खरीद नहीं सकता।
दीप्ति
गोरा हो