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  • नए साल में कन्याकुमारी से कश्मीर के लेह लद्दाख तक की यात्रा करेगी जसपुर की इंजीनियर

बाइक से दुनिया देखेंगी टाटा स्टील की महिला इंजीनियर शीतल संगीता एक्का

5 वर्ष पहले
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जमशेदपुर. नाम शीतल संगीता एक्का, मगर इरादा फौलादी। उम्र 24 साल, टाटा स्टील के कोक प्लांट में जूनियर इंजीनियर हैं। प्लांट में 1200 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करती हैं। खारता वैली और डेजर्ट एक्सपिडिशन का हिस्सा बन चुकी शीतल अब बाइक से दुनिया देखना चाहती हैं।
फिलहाल, भारत भ्रमण के लिए निकलेंगी। वह भी अकेले, भारी भरकम मोटरसाइकिल से। नए साल में कन्याकुमारी से कश्मीर के लेह-लद्दाख तक की यात्रा करेंगी। शीतल तैयारियों में जुटी हैं। कठिन अभ्यास कर रही हैं। सड़कों पर भारी-भरकम बाइक दौड़ाते इस युवती को अक्सर देखा जा सकता हैं। प्रतिदिन जमशेदपुर से रांची बाइक से करीब 250 किमी अाना-जाना करती हैं। वह भी बिना रुके। वे बाइक से एक दिन में 400 किमी का सफर कर सकती हैं। शीतल के शौक को कुछ लोग दीवानगी कहते हैं, तो कोई जोखिम भरा काम। कई नसीहत भी देते हैं। इन बाताें से बेपरवाह शीतल कहती हैं, “चुनौती स्वीकार करना मेरा पैशन है। डिप्लोमा करते समय कहा गया कि लड़की हो, इसीलिए सोच समझकर विषय चुनो। लेकिन मैंने मेटलर्जिकल विषय का चुनाव किया। क्लास की टॉपर बनी। टाटा स्टील में जूनियर इंजीनियर के रूप में चयन हुआ। इसलिए कंपनी के कोक प्लांट में काम करने की चुनौती स्वीकार की। नौकरी से पहले पिता का साया सिर से उठ गया था। परिवार चलाने की जिम्मेवारी मुझ पर थी। मैंने अपने दायित्वों का निर्वाह किया। बचपन से एडवेंचर पसंद है। अब बाइक से विश्व भ्रमण कर मैं दुनिया को बताना चाहती हूं कि भारत की लड़कियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। वे शीतल हैं, तो फौलादी और साहसी भी।’ शीतल मूलत: छत्तीसगढ़ के जसपुर की रहनेवाली हैं। जमशेदपुर में वे मां और भाई-बहन के साथ रहती हैं।
बचेंद्री पाल से मिली प्रेरणा
एवरेस्ट विजेता बचेंद्री पाल से मुझे एडवेंचर गेम की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिली। वे टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन की चीफ हैं। उनसे मैंने अपने पैशन के बारे में बताया। उन्होंने पहले पहाड़ों की चढ़ाई का अनुभव लेने की सलाह दी। इसके बाद मैंने नियमित दलमा की ट्रेकिंग की। एक दिन उनका फोन आया-”शीतल गेट रेडी फॉर खारता वैली एक्सपिडिशन।’ साल 2014 में 14 सितंबर से 9 अक्टूबर तक तिब्बत की खारता वैली के एक्सपिडिशन में मैंने हिस्सा लिया। साल 2015 में 19 फरवरी से 24 मार्च तक ग्रेट इंडियन वीमेंस डेजर्ट एक्सपिडिशन में शामिल हुई। इन यात्राओं से मेरा आत्मविश्वास मजबूत हुआ है।
समाज की सोच बदलेगी :
शीतल के अनुसार, कम उम्र से बाइक चलाने का शौक था। लिहाजा, पहली सैलरी मिलते ही बाइक खरीद ली। तब मुझे लोग कहते, बाइक चलाना लड़कियोंं का काम नहीं है। हमारे समाज में आज भी लड़का जो करे वह ठीक और लड़की बाइक चलाए तो गलत। उम्मीद है कि एक दिन समाज की सोच जरूर बदलेगी।