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लोक आस्था का महापर्व, गली-मोहल्लों में गूंजने लगे छठ गीत

Dainik Bhaskar

Oct 27, 2014, 04:50 AM IST

खरना में व्रतधारी मिट्टी अथवा ईंट के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर रोटी व रसिआव बनाते हैं।

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जमशेदपुर. केलवा के पात पऽ उगलन सूरज मल झांकी-झुकी... घरे-घरे सुपवा किनाए लागलऽ... आदि छठ गीतों से शहर के गली-मुहल्ले गुंजने लगे हैं। पांच दिवसीय दीपोत्सव के बाद हर ओर छठ को लेकर भक्तिमय माहौल देखा जा रहा है।
लोक आस्था का महापर्व छठ सोमवार को लौकी-भात से शुरू हो जाएगा। इसके लिए घरों की साफ-सफाई की जा चुकी है। सोमवार को व्रतधारी सुबह में स्नान के बाद लहसुन-प्याज के बिना तैयार भोजन ग्रहण करेंगे। इस दिन भोजन में व्रतधारी अरवा चावल का भात, चना दाल व लौकी (कद्दू) की सब्जी खाते हैं। इसके साथ ही चार दिवसीय पर्व शुरू हो जाएगा। पर्व के दूसरे दिन (मंगलवार) की शाम व्रतधारी खरना करेंगे। खरना में व्रतधारी मिट्टी अथवा ईंट के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर रोटी व रसिआव (चावल व गुड़ से बनी खीर) बनाते हैं। पूजा के उपरांत पहले व्रतधारी इसे ग्रहण करते हैं, फिर परिजन व दोस्तों में बांटा जाएगा। तीसरे दिन शाम में व्रतधारी नदी-तालाब के किनारे अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगे। बुधवार को उदयगामी सूर्य को अर्घ्य के साथ पर्व संपन्न हो जाएगा।
बाजार में 30 रुपए किलो तक बिकी लौकी
रविवार को बाजार में लौकी की जबरदस्त मांग रही। सोमवार की सुबह भी लौकी की मांग रहने की उम्मीद है। रविवार को शहर के प्रमुख सब्जी मंडी में लौकी 20 रुपए प्रति किलो की दर से बिकी, जबकि शहर के अन्य बाजार में इसकी कीमत 25 से 30 रुपए रही।
सज गया है बाजार
छठ पूजा के लिए रविवार से बाजार सज गए हैं। शहर के प्रमुख बाजार में छठ पूजा में उपयोग होने वाली सामग्री का स्टाल लग गया है। दुमका, ओडि़शा और बिहार से सूप-दउरा का पर्याप्त स्टाक आ गया है। दो दिनों में केला (घवद) के 13 ट्रक पहुंच चुके हैं। फल व्यापारी मो. सेराज के अनुसार, मंगलवार सुबह तक 20 ट्रक और केला आने की उम्मीद है। व्यापरियों की ओर से ईख का भी पूरा स्टाक कर लिया गया है। पिछले वर्ष 8 से 10 रुपए में बिकने वाली ईख इस बार 15 से 20 रुपए में बिक रही है। शहर के चौक चौराहे पर नारियल व गागल (बड़ी नींबू) का स्टाल सज गया है। रविवार को एक नारियल की कीमत 15 से 20 रुपए थी जबकि गागल 10 से 15 रुपए की दर से बिका। बाजार में नारियल व गागल के स्टॉक को देखते हुए बाजार के जानकारों का कहना है कि अंतिम समय में इनकी कीमत कम होगी। बाजार में स्टाक अधिक है और उस अनुपात में मांग कम है। इसके अलावा छठ पूजा में उपयोग होने वाले फल मसलन पानी फल, शकरकंद, जायफल, बेर, मूली, गाजर, बरबट्टी समेत अन्य फल एक साथ मिलाकर डेढ़ सौ रुपए प्रति किलो के भाव से बिक रहे हैं।
मौसम की बेरुखी से नहीं सूखा गेंहूू
छठ पर विशेष रूप से बनने वाला ठेकुआ शुद्ध रूप से तैयार गेंहूू के आटे से बनता है। व्रतधारी गेंहूू को शुद्ध जल से धोते हैं। फिर सुखाकर व चुनकर इसकी पिसाई होती है। इस वर्ष सोमवार से शुरू हो रहे छठ पर्व से पहले रविवार की सुबह अचानक मौसम के मिजाज बदलने से व्रतधारी पशोपेश में पेड़ गए। रविवार को दिनभर बूंदाबांदी होती रही, जिससे व्रतधारी गेंहूू नहीं सूखा पाए। हालांकि साधन संपन्न लोगों ने पंखे और रूम हीटर के सहारे गेंहूू सुखाने का प्रयास किया।
कोसी का है विशेष महत्व
छठ में कोसी का विशेष महत्व होता है। घर परिवार में शुभ कार्य होने पर या मन्नत पूरी होने पर कोसी भरने का रिवाज है। कोसी दो तरह से भरी जाती है। एक बारह तथा दूसरा चौबीसा। बारह कोसी में 12 कोसी ढकना के साथ 12 ईख का उपयोग होता है। जबकि चौबीसा में सभी सामान की संख्या 24 होती है। जिन व्रतधारियों के घर कोसी भरी जाती है, उनके यहां अस्ताचलगामी (शाम के समय) सूर्य को अघ्र्य देने के बाद व्रतधारी घर पहुंचकर आंगन को गाय के गोबर से लिप कर बीच में हाथी के कलश पर चहुंमुखी दीया जलाते हैं। उसके चारों ओर कोसी रखी जाती है। इसमें चिउड़ा, ठेकुआ समेत अन्य पूजन सामग्री रखी जाती है। फिर उसपर दीया जलाया जाता है। इसके बाद ईख से कोसी के चारों ओर घेरा बनाया जाता है। इससे पहले ईख को नए वस्त्र से बांधा जाता है, जिसे चननी कहते हैं। चननी परिवार का बड़ा बेटा या मुखिया बांधता है। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक छठ गीत गाती हैं और पूजा होती है। फिर घर के सदस्य व परिजन कोसी को प्रणाम करते हैं। अहले सुबह कोसी नदी घाट या तालाब के किनारे ले जाई जाती है, जहां पूरी विधि से कोसी भरी जाती है। कोसी भरने के तुरंत बाद सूर्योदय के पहले घर में लाकर रख दिया जाता है।
भुइंपरी से होती है हर मन्नत पूरी
उत्तर भारत में छठ पर्व का विशेष महत्व है। यह पर्व लोगों द्वारा पूरी निष्ठा व श्रद्धा से मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो श्रद्धालु निष्ठा व श्रद्धा से भुइंपरी करते हैं, उनकी सभी मनोकामना पूरी होती है। भुइंपरी में श्रद्धालु घर के पूजा स्थल से छठ घाट तक भूमि पर लेटकर जाते हैं। श्रद्धालु अपने शरीर के बराबर एक कंडा (मुज में होता है) या बांस की लकड़ी लेते हैं। श्रद्धालु जमीन पर लेटकर उस लकड़ी के सहारे आगे की जमीन पर निशान लगाते हैं। फिर उस निशान से लेटकर आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार व्रती घाट तक पहुंचते हैं। फिर नदी या तालाब में स्नान के बाद वे सूर्य को अघ्र्य देते हैं।
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छत पर भी कर सकते हैं पूजा

नदी किनारे घाट की कमी व पर्याप्त सफाई नहीं होने के कारण शहर के कई कॉलोनी में श्रद्धालु गड्ढ़ा खोदकर और उसमें पानी जमा कर छठ पूजा करते हैं। वहीं, कुछ लोग छत पर टब में पानी रखकर भी छठ पूजा करते हैं। पंडित दिनेश पांडेय के अनुसार, छठ प्राकृतिक पूजा है। नदी, सरोवर के किनारे इसे करने का विशेष महत्व है। लेकिन, जो श्रद्धालु ऐसा नहीं कर सकते, वे घर के सामने या छत पर पानी रखकर निष्ठा से पूजन कर सकते हैं।
 
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दो माह में पूरी हो गई मन्नत

मेरा इकलौता बेटा बीआईटी मेसरा से बीटेक की डिग्री लेने के बाद भी बेरोजगार था। मैंने भुइंपरी की मन्नत मांगी। इसके दो महीने बाद ही टाटा स्टील में उसकी नौकरी हो गई। यह छठ मइया की कृपा से हुआ। अब परिवार के सभी लोग पूरी निष्ठा से हर वर्ष छठ पूजा करते हैं। महेश पांडेय, रामनगर, कदमा निवासी
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