जमशेदपुर. मानसिक रूप से कमजोर (नि:शक्त) बच्चों को आमतौर पर समाज में उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। इन बच्चों के प्रति ज्यादातर लोग मन में यह अवधारणा पाल लेते हैं कि ये बेकार हैं, इनसे कुछ होगा नहीं। लेकिन इन्हीं बच्चों के जीवन में रंग भरने और उन्हें सबल बनाने का बीड़ा उठाया है पूर्व अंतरराष्ट्रीय साइकिलिस्ट अवतार सिंह ने। इस नेक कार्य में अवतार सिंह की पत्नी सुखदीप कौर भी उनका कदम दर कदम साथ निभा रही हैं।
अवतार ऐसे बच्चों की मदद के लिए जीविका नामक संस्था चलाते हैं। संस्था के माध्यम से बच्चों को सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा दी जाती है। इसके बाद उन्हें रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण दिया जाता है। ताकि ये बच्चे आत्मनिर्भर होकर अपने को सबल बनाने के साथ समाज में अपनी अलग पहचान बना सकें। इस क्षेत्र में बेहतर सेवा के लिए बिहार की एक संस्था अवतार सिंह को डॉ राजेंद्र प्रसाद सेवा सम्मान से सम्मानित कर चुकी है। अवतार सिंह नेशनल साइकिलिंग चैंपियनशिप का सात बार खिताब जीत चुके हैं। उन्होंने 1978 में कनाडा में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स और 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियन गेम्स में भारतीय साइकिलिंग टीम का नेतृत्व भी किया है।
रिटायर होने के बाद 2009 में किया जीविका का गठन
टाटा मोटर्स से सेवानिवृत्त होने के बाद अवतार सिंह ने 2009 में जीविका नामक संस्था की शुरुआत की। दो साल तक काम करने के बाद 2011 में संस्था का निबंधन करवाया गया। संस्था के संचालन के लिए सुभाष संघ की ओर से उन्हें सोनारी में भवन उपलब्ध कराया गया। यहां वह फिलहाल 23 नि:शक्त बच्चों को सामान्य शिक्षा के साथ स्पेशल गेम्स का प्रशिक्षण दे रहे हैं। इन बच्चों को यहां रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण जैसे गिफ्ट पेपर बैग, शगुन बैग,दीया, वैक्स दीया आदि बनाना भी सिखाया जाता है। इसके लिए चार छात्रों को संस्था की ओर से छात्रवृत्ति भी दी जाती है।
बच्चों के फोन से मिलती है खुशी
अवतार सिंह की पत्नी सुखदीप कौर कहती हैं कि उन्हें सबसे अधिक खुशी तब होती है, जब कोई पूर्ववर्ती छात्र उन्हें फोन करता है और कहता है कि मैंने इस स्पर्धा में पदक जीता है या फिर मेरा यह काम ठीक से चल रहा है। ज्यादातर छात्र हमारे पास ऐसे आते हैं, जो बोल नहीं पाते, लेकिन यहां से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद लडख़ड़ा कर ही सही वे बोलने लगते हैं। जब उनकी आवाज टेलीफोन अथवा
मोबाइल पर सुनती हूं, तो बहुत ज्यादा खुशी मिलती है।
अलग-अलग लेवल में दिया जाता है प्रशिक्षण
इन बच्चों को प्रशिक्षण देने के लिए तीन अलग- अलग लेवल में बांटा गया है। प्रशिक्षण देने के लिए संस्था ने दो शिक्षक भी नियुक्त किया है। आर्ट प्रशिक्षण के लिए पार्ट टाइम आर्टिस्ट को यहां बुलाया जाता है। प्रशिक्षण देने वालों को संस्था की ओर से भुगतान किया जाता है। वहीं स्कूल में आने वाले 20 फीसदी सामान्य परिवार के बच्चों से मासिक 300 रुपए शुल्क लिया जाता है।
सामान्य खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देना नहीं भाया
खेल से संन्यास लेने के बाद अवतार सिंह ने पटियाला कोचिंग प्रशिक्षण केंद्र से प्रशिक्षण लिया। इसके बाद वे साइकिलिंग की राज्य टीम और नेशनल टीम के खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने में जुट गए। पर जल्द ही मुझे ऐसा लगा कि जो खिलाड़ी हैं, उनकी इच्छाएं बहुत ज्यादा हैं,लेकिन वे इच्छानुसार मेहनत नहीं करना चाहते। इस लिए उन्होंने सामान्य खिलाड़ियों को कोचिंग देना बंद कर दिया। टाटा मोटर्स में काम करते हुए उन्होंने आशा किरण और स्टार्ट नामक संस्था से जुड़े मानसिक रूप से नि: शक्त बच्चों को प्रशिक्षण देना आरंभ किया। इसका काफी अच्छा परिणाम निकला। यहां के बच्चों ने राज्य और देश स्तर पर ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर आयोजित स्पेशल गेम्स में बेहतर प्रदर्शन कर देश का नाम रोशन किया। इस सफलता के बाद से उनमें इन बच्चों के लिए काम करने का जज्बा जाग गया। अवतार से प्रभावित होकर उनकी शिक्षिका पत्नी सुखदीप कौर भी नौकरी छोड़ उनकी संस्था में हाथ बंटाने लगीं।