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डाउनलोड करेंधनबाद. 90 साल के शिवशंकर को देश की गुलामी बचपन से ही घिक्कारती थी। इस वजह से पढ़ाई-लिखाई में भी उनका मन नहीं लगा। पांचवीं में पढ़ाई के दौरान ही वे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई से जुड़ गए।भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने जोर-शोर से हिस्सा लिया। जगह बदल-बदल कर अंग्रेज अफसरों और प्रशासन की घेराबंदी की। जिससे अंग्रेजों की नाक में दम हो गया था। कई साथी गिरफ्तार हो गए, तो आंदोलन को चलाने के लिए वे भूमिगत हो गए। लेकिन 23 जनवरी, 1943 को वे भी गिरफ्तार हो गए।
जवानी आजादी की लड़ाई में झोंक दी। ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लिया। वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। महीनों भूमिगत भी रहे। पकड़े जाने के बाद जेल में भी रहना पड़ा। वर्षों के संघर्ष के बाद आजादी मिली। हमारी अपनी सरकार बनी। इसके बाद भी शिवशंकर ठाकुर में देशभक्ति का वही जज्बा बरकरार रहा। जब भी देश या देशवासियों पर कोई संकट आया, शिवशंकर ने उसी जज्बे के साथ उसका सामना किया।
...इसलिए इंदिरा ने शुरू कराया सेनानियों के सम्मान का चलन
शिवशंकर ठाकुर ने दैनिक भास्कर को इंदिरा गांधी से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया सुनाया। सम्मान के लिए दिल्ली बुलाए जाने पर उन्होंने पीएम इंदिरा गांधी ने पूछा कि आखिर उनका सम्मान क्यों किया जा रहा है। इंदिरा ने उन्हें बताया कि वह वर्ष 1971 में रूस की संसद गई थीं। वहां कुछ बुजुर्गों को आते देख राष्ट्रपति व पीएम खड़े हो गए थे। तब इंदिरा के पूछने पर रूसी प्रधानमंत्री ने उन्होंने बताया कि ये स्वतंत्रता सेनानी हैं, जिन्हें सम्मान के लिए बुलाया गया है। इसके बाद ही इंदिरा गांधी ने भारत में भी स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करने का चलन शुरू कराया।
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