(सेमिनार में मौजूद एमजीएम अस्पताल के चिकित्सक।)
जमशेदपुर। अस्थमा (दमा) के अटैक के दौरान सबसे कारगर उपाय नेबुलाइजेशन थेरेपी है। इसमें तत्काल मरीज के फेफड़े तक दवा पहुंचकर श्वास में घुल जाती है और आराम देती है। इसका उपयोग आज अस्पतालों के इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) और क्रिटिकल केयर यूनिट (सीसीयू) तक में किया जा रहा है। इस थेरेपी का उपयोग इन्हेलर के माध्यम से भी किया जा सकता है। यह बातें एमजीएम अस्पताल के मेडिसीन विभाग के हेड डॉ निर्मल कुमार ने नेबुलाइजेशन थेरेपी पर आयोजित सेमिनार में कही। सेमिनार का आयोजन अस्पताल के मेडिसीन विभाग सभागार में किया गया था।
क्यों होती है बीमारी
अस्थमा जेनेटिक बीमारी है। यदि माता-पिता को अस्थमा है, तो उनके बच्चों को भी इस बीमारी से ग्रसित होने की आशंका रहती है। इसके अलावा कम उम्र में होने वाला संक्रमण, गर्भावस्था में महिला द्वारा धूम्रपान, समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चे, घास या जानवरों के संपर्क में रहने से अस्थमा होने की आशंका रहती है।
क्या होती है परेशानी
अस्थमा होने पर मरीज की श्वास नली में सूजन आ जाती है। इससे सही प्रकार से सांस लेने में परेशानी होती है और सही मात्रा में ऑक्सीजन के शरीर में नहीं जाने से सांस फूलने लगती है।
बीमारी के लक्षण
- सामान्य शारीरिक श्रम वाले काम में भी सांसें फूलना
- सांस लेते समय तेज घरघराहट की आवाज आना
- लगातार जुकाम रहना
- आंखों में खुजलाहट
- शरीर में चकते निकल आना।
क्या बरतें सावधानी
- प्रदूषित वातावरण, धुआं और धूल वाले स्थानों से दूर रहें।
- तैलीय भोजन से परहेज करें।
- रेशेदार सामान, जानवर के पास न जाएं।
- सर्दी से बचें।
- बंद कमरे में आग या धुआं न करें।
क्या करना चाहिए
चिकित्सक अस्थमा की जांच के लिए पीक एक्सीपेटरी फ्लोमीटर और स्पायरोमीटर का प्रयोग करते हैं। इसके अलावा रोगी को हमेशा अपने साथ एक इन्हेलर रखना चाहिए, ताकि सांस फूलने पर उसका उपयोग कर सकें।
ये थे उपस्थित
डॉ रमेश प्रसाद, डॉ केके अय्यर, डॉ ललित कुमार, डॉ निकिता वर्मा, डॉ मनीष सहित काफी संख्या में सीनियर व जूनियर रेजिडेंट।