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अब आओ प्रभु हाथ थाम ले चलो द्वारिका...

7 वर्ष पहले
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श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन सोमवार को रुक्मिणी स्वयंवर की कथा का वर्णन संगीतमय वाद्य यंत्रों की मधुर तान के साथ हुअा। रुक्मिणी के बड़े भाई रुक्मी ने अपनी बहन के स्वयंवर का आयोजन किया। उन्होंने विभिन्न राज्यों के राजाओं को आमंत्रण तो भेजा परंतु उन्होंने अपनी लाडली बहन से कहा कि वह उनके मित्र महाराज शिशुपाल को ही अपना वरमाला पहनाना। उन्हें क्या मालूम की भगवान श्रीकृष्ण की छवि जिसके मन में एक बार बस जाय उसमें अन्य किसी काे स्थान कहां मिल सकता है। अपने भाई की बातें सुनकर राजकुमारी रुक्मिणी मन ही मन दु:खी हो जाती हैं। उन्होंने एक पाती लिख गोविंद को भेज दिया, जिसमें उन्होंने लिखा, गोविंद मैंने आप देखा तो नहीं परंतु गुणों के बारे में सुना है। तभी से मैं तुम्हारी होकर रह गई हूं। अब आओ प्रभु मेरा हाथ थामो और द्वारिका ले चलो। भगवान श्रीकृष्ण को जैसे ही पीय की पाती मिलती है, वह तुरंत चल पड़ते हैं। भगवान को जाते देख बलराम भी उनके पीछे-पीछे चल देते हैं। वहां माता कात्यायनी के मंदिर में दर्शन के लिए माता रुक्मिणी आती हैं। जहां से भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी को अपने रथ पर बैठाकर द्वरिका ले आते हैं।

दिव्य झांकी का हुआ प्रदर्शन

रुक्मिणीविवाह के इस मनोहर दृश्य का बाल व्यास महाराज विवेक जी पंडित ने बड़े ही राेचक ढंग से संगीतमय वर्णन कर लोगों को मंत्र-मुग्ध कर दिया। झांकी में भगवान श्री कृष्ण तथा रुक्मिणी का जयमाल होता है। महिलाओं ने अपनी इच्छानुसार कन्या विदाई की रश्म अदा की। दहेज स्वरुप रसोई के सारे सामान तथा गहने भी दान में दिए। वहीं पंडित जी के आह्वान पर चक्रधरपुर के कई लोग चित्रकूट में महाराज जी के आश्रम निर्माण के लिए गुप्त दान भी कर रहे हैं।

रुक्मिणी और भगवान श्रीकृष्ण के जयमाल की झांकी।