पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • रोटी के लिए पानी और पानी के लिए जंगल की है जरूरत

रोटी के लिए पानी और पानी के लिए जंगल की है जरूरत

6 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
जल,जंगल और जमीन का स्वामित्व ग्राम सभा और स्वशासन व्यवस्था के अधीन करने को लेकर वनाधिकार मंच झारखंड की ओर से एक कार्यक्रम मंगलवार को गिरिडीह के जालान धर्मशाला किया गया। नया सवेरा विकास केंद्र, ऑक्सफेम इंडिया, पैक्स झारखंड और एकता परिषद की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न प्रखंडों से आए लोगों को वनाधिकार अधिनियम की जानकारी दी गई। आगामी 16 से 22 फरवरी को जिले के बगोदर, बेंगाबाद, डुमरी, गांडेय, पीरटांड, जमुआ, तिसरी, सरिया, बिरनी आदि प्रखंडों में होने वाले ग्राम सभा को बेहतर तरीके से करने के लिए आयोजित कार्यक्रम में आदिवासियों और वनवासियों को अधिकार पत्र देने पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में बतौर मुख्यअतििथ मौजूद जिला कल्याण पदाधिकारी किशोर कुमार शर्मा ने कहा कि वनाधिकार के प्रति जागरूकता देख ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आने वाले समय में जिले में बड़े पैमाने पर इसका लाभ लोगों को मिल सकेगा।

वनाधिकार के लिए इस गतिविधि से समिति को अवगत कराई जाएगी। कार्यक्रम में विषय प्रवेश कराते हुए रामस्वरूप ने कहा कि हर इंसान को पेट के लिए रोटी, रोटी के लिए जमीन, जमीन के लिए पानी और पानी के लिए जंगल पर आश्रित रहना पड़ता है।

अन्य राज्यों की तुलना में झारखंड है काफी पीछे

सामाजिककार्यकर्ता रामदेव विश्वबंधु ने कहा कि आदिवासी है तो जंगल है। इतिहास साक्षी है कि जल, जंगल, जमीन की लड़ाई 1855 से शुरू हुई। जिसका परिणाम एसपी एक्ट के रूप में 1949, सीएनटी एक्ट 1908, विलकिंसन रूल 1832 कोढ़कारी कानून के रूप में आया। लोगों के संघर्ष का परिणाम है कि एक जनवरी 2008 को देश में यह लागू हुआ। लेकिन दुर्भाग्य है कि जिस तरह छतीसगढ़, मध्यप्रदेश और उड़ीसा में लाखों परिवारों को वनाधिकार पत्र प्राप्त हुआ। उसके मुताबिक झारखंड सबसे पीछे हैं। यहां मात्र 17 हजार परिवारों को ही वनाधिकार पट्‌टा मिला है जो शून्य के बराबर है। जबकि कुल आबादी का 27 फीसदी यहां आदिवासी है।

कार्यक्रम को संबोधित करते सामाजिक कार्यकर्ता।