मैनेजमेंट में व्यस्त रहे प्रत्याशी
चुनावके एक दिन पूर्व सभी प्रत्याशी के करीबी बूथ मैनेजमेंट में दिनभर व्यस्त दिखे। बूथ मैनेजमेंट के लिए प्राधिकृत नेताजी के फोन दिनभर ऐसे घनघना रहे थे मानों चुनाव जीतने के बाद बधाई दी जा रही हो। नेताजी के घनघनाते फोन ने पांच साल के फुर्सत भरे लम्हों में से व्यस्तता दिखाने का भी मौका मिल गया। नेताजी मुंह में पान का बीड़ा दबाए फोन से कार्यकर्ताओं से बात करने में मशगूल रहे। आखिर हो भी क्यों नहीं पांच साल के बाद नेताजी के आगे पीछे कर महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर तिजोरी को अपने हाथों से खोलने का अवसर जो मिला था। कार्यकर्ता भी नेताजी के पीछे ऐसे पड़े थे जैसे कि आज ही रिजल्ट की घोषणा हुई हो और माननीय बनकर विधानसभा पहुंचने का गौरव प्राप्त किए नेताजी को बधाई देने में पीछे ना रह जाए। कई तो ऐसे व्यस्त दिखे मानों उसके जिम्मे बडी कंपनी का महत्वपूर्ण जिम्मेवारी हो जिसे समय पर पूरा नहीं किया गया तो आफत जाएगी।
बूथ खर्च के नाम पर राशि में भिन्नता की बात सामने रही है। जिस दल का पलड़ा भारी है वैसे प्रत्याशी सबसे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। वहीं ऐसे प्रत्याशी जिन्हें अपनी स्थिति का पूर्वाभ्यास हो गया है वैसे नेता ज्यादा खर्च करना मुनासिब नहीं समझ रहे हैं। हालांकि थोड़ी बहुत ही सही सभी बूथों पर अपने एजेंट बैठाने का मौका हाथ से गंवाना नहीं चाह रहे हैं। जीत को लेकर आश्वस्त दिख रहे नेताजी बूथ खर्च के अलावा भी अलग से खर्च की व्यवस्था करवाने की भी चर्चा जोरों पर हैं। जानकारों की मानें तो लीड रोल कर रहे प्रत्याशी खर्च करने में अपने प्रतिद्वंदी से उन्नीस नहीं रहना चाह रहे हैं।
बूथ मैनेजमेंट के लिए जहां नेताजी तरह तरह के हथकंडे अपना रहे थे और हैसियत के अनुसार कार्यकर्ता को मैनेज करने में लगे थे वहीं कार्यकर्ता भी नेताओं के आंखों में धूल झोंकने में पीछे नहीं रहे। मतदान के महत्व को बगैर समझे पांच साल के बाद मानों एक अवसर के तौर पर उसे देखने का काम किया जा रहा था। कई लोग तो एक से अधिक पार्टियों के बूथ लिस्ट में अपना नाम चढ़ाकर बूथ खर्च को हड़पने में भी पीछे नहीं रहे। इसका खुलासा बहुत बाद में हुआ। हालांकि नेताजी को इस बात से कौन समझाए कि एक ही व्यक्ति का नाम दो से अधिक दलों के पास बूथ कमिटी में दर्ज है।
अपनी स्थिति भांप कर खर्च कर रहे प्रत्याशी
नेता डाल डाल तो जनता पात पात