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मौसमी बीमारियांे से झोला छाप चिकित्सकों की है बल्ले-बल्ले
मौसमीबीमारियों के इस मौसम में ग्रामीण क्षेत्र में झोला छाप चिकित्सकों की बल्ले बल्ले हो गई है। भोले भाले ग्रामीण इन चिकित्सकों के झांसे में आकर समय और पैसा दोनों बेहिसाब खर्च कर रहे हैं। इसके बाद भी नतीजा सिफर साबित होता है। अंतत: रोगी की स्थिति बेहतर होने की बजाए बदतर हो जाती है। कभी कभी स्थिति गंभीर भी हो जाती है। जागरूकता के अभाव में ग्रामीण इन झोला छाप चिकित्सकों के चक्कर में पड़ ही जाते हैं।
छोटी मोटी बीमारी होने पर ग्रामीण अनुभवी डाक्टरों से इलाज कराने की बजाए झोला छाप चिकित्सक पर भरोसा कर लेते हैं। इसी भरोसे का गलत फायदा झोला छाप चिकित्सक उठाते हैं और कम दाम की दवा को अधिक कीमत पर रोगी को दे देते हैं। जिस कारण मरीज का स्वास्थ्य और बिगड़ने लगता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग असावधानी के कारण भी बीमारी की चपेट में रहे हैं। बीमारी की सही जानकारी के अभाव में थोड़ी भी परेशानी का अनुभव होने पर वे तुरंत हड़बड़ा जाते हैं और तत्काल दवा खाने की सोचने लगते हैं। इस स्थिति में उनके समक्ष आसपास घूमने वाले झोला छाप चिकित्सकों पर ध्यान चला जाता है और उसे अविलंब बुलाया जाता है। बस इसी फिराक में झोला छाप चिकित्सक रहते हैं। वे ग्रामीणों को घुमा फिरा कर समझा देते हैं और बीमारी को बढ़ा चढ़ा कर रुपये ऐंठने की तरकीब ढूंढ निकालते हैं। थोडी बहुत दवा देकर भारी भरकम राशि की वसूली करते हैं। वे कर्ज में डूब जाते हैं, लेकिन चिकित्सक को सिर्फ पैसे की चिंता रहती है। मरीज ठीक हो या नहीं इसकी परवाह उन्हें नहीं है।
ये झोला छाप चिकित्सक नीम हकीम खतरे जान की कहावत को भी चरितार्थ कर रहे हैं। जरूरत नहीं होने के बाद भी वे मरीज को काफी मात्रा में दवा की खुराक दे देते हैं। अधिकांश मामलों में पानी चढ़ाने का काम निश्चित रूप से किया जाता है। कम कीमत की दवा का दाम काफी ज्यादा कीमत पर बेच रहे हैं। इसके साथ अधिकृत कंपनी की दवा बेचकर चालू कंपनी की दवा को धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। जिसमें उसे काफी ज्यादा मात्रा में कमीशन दवा दुकानों से मिलती है।
दोतरफा मार झेल रहे हैं ग्रामीण
खोल रखे हैं क्लिनिक
कभीपैदल दवा की बैग टांगे चलने वाले चिकित्सक आज मोटरसाइकिल से गांव गांव का दौरा कर रहे हैं। वे अपना निर्धारित गांव भी तय कर रखे हैं। प्रतिदिन किस किस गांव का दौरा करना है इसकी पूरी तैयारी वे किए रहते हैं।