खोई पहचान पाने की जद्दोजहद में गिरिडीह
मनोज कुमार पिंट.अंजनी सिन्हा/गिरिडीह
गिरिडीह में सब कुछ बेहतर है सिवाय चुनावी चोंचलेबाजी भरे दावे करने वाले जनप्रतिनिधियों के कार्य करने की संस्कृति का। संभवत इसी का परिणाम है कि समस्याओं के ढेर पर बैठा झारखंड का यह नक्सल प्रभावित गिरिडीह जिला अपनी पहचान बनाने को ले लगातार संघर्ष कर रहा है। इस कारण गिरिडीह की वर्तमान पहचान नए पहचान बनाने की जद्दोजहद में कई वर्ष पीछे चला गया है। पीछे जाने से संबंधित तर्क आधारभूत संरचना से जुड़ा है। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्र की बिजली आपूर्ति, बेहतर सड़क और बेहतर कनेक्टिविटी के लिए मजबूत मोबाइल और इंटरनेट का होना। यह काफी मायने रखता है। दो दिन पूर्व भाजपा के नगर कमेटी के बैनर तले शहर के अंबेडकर चौक पर धरना का आयोजन किया गया था। धरना तो शहर के कई समस्याओं के लिए दिया गया था।
भाजपा का यह धरना शहर के सवा लाख आबादी के जेहन में अनगिनत सवाल छोड़ गया। आम लोगों के जेहन में यह सवाल कौंध रहा था कि आखिरकार धरने का औचित्य क्या हैω गिरिडीह के कई राजनीतिक दलों के नेता और कार्यकर्ताओं ने भाजपा के धरने पर एतराज भी जताया। हालांकि किसी राजनीतिक दल के समाचार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कार्यालय में विरोध जताने से जुड़ा रिलीज तो नहीं जारी किया गया था। लेकिन कई समाचार चैनलों में कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपना बाइट देकर भाजपा के धरने पर सीधे तौर पर सवाल उठाया। सवाल उठाना भी लाजिमी है। कारण कि भाजपा के जितने नेता और कार्यकर्ता धरने पर सांसद और विधायक की मौजदूगी में बैठे थे। आसन्न विस चुनाव से तीन माह पूर्व लोस चुनाव संपन्न हुआ था। वर्तमान सांसद ही बीते पांच वर्ष पहले गिरिडीह लोस का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जबकि गिरिडीह के वर्तमान विधायक विगत पांच वर्षों से झारखंड विस में गिरिडीह का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
धूल भरी सड़कों से गुजरने को विवश लाेग
धूलसे भरे शहर की बात भी की जाए तो, शहर की आबादी को धूल भरी सड़कों का सामना भी प्रतिदिन करना पड़ता है। शहर की जर्जर सड़काें का मुद्दा तो पूर्व में कई बार सरकारी बैठकों में इन जनप्रतिनिधियों द्वारा उठाने के बाद प्रशासन ने विभिन्न मदो से सड़क बनाने की स्वीकृति दी थी। लेकिन सड़कें बनने के साथ ही तीन माह में इन सड़कों ने प्रशासन, और संवेदकों की कार्यसंस्कृति की पोल खोल दी है। अधिकारियों ने पूरे शहर की सड़कों का दौरा किया प