महिलाओं के हौसले से 30 एकड़ जंगल में लौटी हरियाली
उजड़चुके जंगल की बंजर हो चुकी भूमि से सखुआ के जड़ों को खोदने में बड़ी संख्या में लगे लोगों को रोक पाने में पुरुष असमर्थ थे। वन विभाग के कर्मी भी अनदेखी कर रहे थे। बार-बार आग्रह पर भी कोई सामने नहीं आया। जंगल के आधे हिस्से की भूमि से सुखआ की जड़ें भी निकल चुकी थी। ऐसे में शेष जड़ों को बचाने के लिए जब सारी कवायद फेल हो चुकी तो एक गांव की महिलाओं ने इसे चुनौती के रूप में लिया। असमर्थ पुरुषों को देख उन्होंने अपनी कमर कसी। संगठन बनाई और एक-एक कर पूरा गांव उनके साथ आया। महिलाओं का यह प्रयास रंग लाया और आज पूरे जंगल में हरियाली है। जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर गिरिडीह उसरी नदी के किनारे बसे इस गांव में करीब डेढ दशक से चली रही यह प्रक्रिया आज भी जारी है।
तीन पाली में करती हैं सुरक्षा, पेड़ काटने पर वसूलती हैं जुर्माना
महिलाएंबताती हैं कुल तीन पाली में जंगल की वे सुरक्षा करती हैं। इसके लिए आठ आठ महिलाओं की टीम बनी है। किसी दिन किसी की अनुपस्थिति की भरपायी के लिए एक महिला को अतिरिक्त रखा गया है। इन महिलाओं के पीछे पूरे गांव की महिलाएं हैं। गलती से यदि जंगल से लकड़ी काटकर कोई ले आता हैं तो उसके विरुद्ध पूरा गांव एकजुट हो जाता है। महिलाओं के नेतृत्व में पंचायत का आयोजन किया जाता है। जिसमें पुरुष भी रहते हैं। पंचायत में अारोपी व्यक्ति से जुर्माने की राशि वसूली जाती है। इस राशि को वे समाज के विकास कार्य में लगाते हैं। इससे यहां एक बेहतर समाज का भी निर्माण हो रहा है।
अहिंसा दिवस (2 अक्टूबर) पर सखुआ के पेड़ों में बांधती है रक्षा सूत्र
मघैयाटोलकी महिलाएं किसी अवसर को याद रखे या नहीं लेकिन 2 अक्टूबर को हमेशा याद रखती हैं। महिलाएं यह जानती है कि देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को है। इस दिन को पूरा देश अहिंसा दिवस के रूप में मनाता हैं। अहिंसा लोगों को हिंसक घटनाओं से सामना करने की सीख देती हैं। यहां की महिलाएं इस अहिंसा दिवस पर पेड़ नहीं काटने का संकल्प एक उत्सव के रूप में लेती है। पूरे गांव की महिलाएं एक झुंड में जमा होकर जंगल जाती है। वहां सखुआ के पेड़ों पर रक्षाबंधन कर उनकी सुरक्षा का संकल्प लेती हैं।
जंगल की सुरक्षा में माैजूद ग्रामीण।
^गांव की महिलाएं प्रत्येक 02 अक्टूबर को जंगल के सखुआ पेड़ों में रक्षा बंधन कर जंगल बचाने का संकल्प लेती हैं। इस दिन पूरा गांव पेड़ों को बचाने के लिए अहिंसा के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। पूरा गांव इस उत्सव में शामिल रहता है।’’ जगदीशमहतो, पंचायतसमिति सदस्य, मघैयाटोल, पिंडाटांड, गिरिडीह
जंगलों की सफाई से निकले पत्ते गांव वालों का बनता है जलावन
करीब632 महिला-पुरुषों की आबादी के इस गांव में अब जलावन के लिए दूसरों पर आश्रित नहीं रहना पड़ रहा है। महिलाएं आवश्यकतानुसार एकबार पूरा गांव जलावन के लिए पत्ते आदि चुनकर लाती हैं। जंगल घना होने पर उनकी झाड़ियों को साफ कर पूरे गांव के लोग इसका उपयोग करते हैं। हल आदि कार्य के लिए जरूरत पड़ने पर लोग लकड़ी आपसी तालमेल से काटते हैं। जिससे इसका लाभ सभी को मिल जाता है। महिलाओं की पांच टीम में कुल पांच महिला कमांडर हैं।
^जंगल बचाने के लिए गांव की महिलाएं पिछले पंद्रह वर्ष से संघर्ष कर रही हैं। इस जंगल को बचाने में पुरुष जब असमर्थ हो गए तो महिलाओं ने इसकी सुरक्षा का बीड़ा उठाया। महिलाएं आठ सदस्यीय टीम बनाकर इसकी सुरक्षा करती है। पंद्रह वर्षों में इस जंगल में अच्छी हरियाली गई है। अब लोग इसका लाभ भी ले रहे हैं।\\\'\\\' दीपाकुमारी मेहता, जिलापरिषद सदस्य, मघैयाटोल, गिरिडीह