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गुलामों जैसा जीवन जीने को विवश हैं जिले के बाल श्रमिक

7 वर्ष पहले
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बालकदेश या समाज की महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं। बालक आने वाली पीढ़ी के सदस्य है, उनकी समुचित सुरक्षा, लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा पर्याप्त विकास का दायित्व भी समाज का होता है। कालांतर में यही बच्चे देश के निर्माण में आधार स्तंभ बनते हैं। देश में बाल-कल्याण को प्रमुखता प्रदान करने के लिए देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिवस को प्रति वर्ष बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। सबसे दुखद पहलू यह है कि विश्व के कुल बाल श्रमिकों का एक बड़ा भाग भारत में है। गिरिडीह भी इससे अछूता नही है। गिरिडीह में कल-कारखाने, गैराज, चाय दुकान सहित अनेक प्रकार के लघु कुटीर उद्योंगो तथा घरेलू कामों में लगे हुए गुलामों जैसा जीवन जी रहे हैं। बाल श्रमिकों के बारे में कहा जाता है कि ये वे किशोर नहीं हैं जो दिन के कुछ घंटे खेल और पढ़ाई से निकालकर जेब खर्च के लिए काम करते हैं, बल्कि ये वे मासूम बच्चे हैं जो वयस्कों की जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। दस से अठारह घंटे काम कर कम पैसे में अधिक श्रम बेचते हैं।

समाज को होना होगा जागरूक : श्रम अधीक्षक

श्रमअधीक्षक जनार्दन प्रसाद तांती ने इस मामले में कहा कि बाल श्रम पर रोक के लिए समाज को जागरूक होना होगा। कानून तो इसकी इजाजत नहीं देता और इसके लिए सख्त कानून भी है। पर केवल कानून से काम नहीं चलेगा। बाल श्रमिकों का रिकॉर्ड विभाग के पास उपलब्ध नहीं है।

श्रमिकों की दुर्दशा

कहातो यह जाता है कि बाल्यावस्था स्वर्ग का आनंद प्रदान करती है, पर बाल श्रमिकों के संदर्भ में यह कहना सटीक होगा कि नरक बचपन के आसपास ही है। जानकारी के मुताबिक सैकड़ों बच्चों को रात में सोने के लिए झोपड़ी भी नसीब नही होती। ऐसे कई बच्चे रेलवे स्टेशन, बस स्टाॅप सार्वजनिक भवनों में रात गुजारते हैं। गिरिडीह में ऐसे बच्चे अधिकतर ग्रामीण इलाकों से आते हैं।

एनजीओ की होती है महत्वपूर्ण भूमिका

इससमस्या से निपटने के लिए केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नही है। बाल श्रमिकों के कल्याण मुक्ति के लिए सरकार स्वयं सेवी संगठनों को वित्तीय सहायता भी प्रदान करती है। गिरिडीह में सर्वेक्षण के बाद यह तथ्य उभर कर आया कि यहां कोई भी एनजीओ बाल श्रमिकों के कल्याण के लिए प्राथमिकता के आधार पर काम नहीं करती।

प्राथमिकता के आधार पर काम नहीं करती एनजीओ

गरीबी है मुख्य कारण

सरकारकी मान्यता है कि इसके