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प्राचीन काल से खोरा में हो रही दुर्गा पूजा
गुमला-रांचीएनएच 23 के किनारे गुमला से करीब सात किमी की दूरी पर स्थित है खोरा का दुर्गा मंदिर। यह मंदिर अति प्राचीन मंदिर है। दशहरा के अवसर पर दूर-दूर से श्रद्धालु यहां आते हैं। इस गांव में विजयादशमी की रात गांव का प्रत्येक आदमी अपने से बड़ों के घर जाकर उन्हें पैर छूकर प्रणाम कर आशीर्वाद प्राप्त करता है। यहां के मंदिर के बारे में प्राचीन कथा प्रचलित है। खोरा गांव में सात टोले हैं। चईरम्बा, खोरा जामटोली, खोरा शकुवाटोली, खोरा कुसुम टोली, खोरा पतराटोली, खोरा पखनटोली एवं खोरा कठियाटोली। इस गांव के जमींदार शिखर साहब थे। उन्होंने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। बताया जाता है कि एकबार वे अपने पुत्र की बारात लेकर क्योंझर, ओडिशा गए थे, लेकिन वहां से लौटने के दौरान उन्हें घोर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। इसके बाद अंग्रेज सरकार के पीपी साहब से कुछ पैसा लेकर खोरा एवं ग्राम मेसरा (कांके, रांची) को गिरवी रख दिया। काफी समय तक शिखर साहब ने पैसे नहीं लौटाए, तो पीपी साहब ने दोनों गांवों को नीलाम कर दिया। नीलामी में राधा बुधिया ने दोनों गांव प्राप्त किए। जमींदारी प्रथा उन्मूलन के पूर्व तक दोनों गांव खोरा एवं मेसरा के जमींदार राधा बुधिया ही थे। बताया जाता है कि गांवों को गंवा चुके शिखर साहब जब गांव छोड़कर जाने लगे तो मंदिर में स्थापित दुर्गा की मूर्ति को भी साथ ले जाने का प्रयास किया। इसके लिए हाथी लाया गया। मूर्ति को हाथी पर विराजमान किया गया, तो हाथी बैठ गया। उसी रात शिखर साहब को स्वप्न आया। इसके बाद उन्होंने मूर्ति को यहां से ले जाने का ख्याल त्याग दिया।