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इतिहास के पन्नों में गुमनाम हैं शहीद तेलंगा खड़िया

6 वर्ष पहले
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तेलंगाखड़िया की याद में प्रत्येक वर्ष 9 फरवरी को मुरगू गांव में विशाल जयंती सह जतरा का आयोजन किया जाता है। इसका आयोजन मयूरी युवा क्लब मुरगू के तत्वावधान में किया जाता है। शुरुआती दौर में जयंती में राज्य के बड़े नेता अधिकारी सिरकत करते थे। मगर जैसे-जैसे राज्य स्थापना का दिन बीतता जा रहा है, जयंती का उत्साह फीका हो रहा है। विगत दो-तीन वर्षों से जयंती समारोह में कोई भी बड़े जनप्रतिनिधि अधिकारी उपस्थित नहीं हुए हैं। हलांकि इस वर्ष की जयंती में मुरगू ग्रामवासियों को काफी अपेक्षाएं जगी हुई है। सिसई विधायक सह विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव, सांसद सह केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सुर्दशन भगत समेत कई नेताओं के पहुंचने की संभावना है। जयंती को लेकर तैयारी पूरी कर ली गई है।

भास्कर न्यूज। गुमला

तेलंगाखड़िया भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक ऐसे गुमनाम सपूत हैं, जिन्होंने अग्रेजी हुकूमत और देशीय जयचंदों के साथ संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। शहीद तेलंगा खड़िया का जन्म गुमला जिले के सिसई प्रखंड क्षेत्र के मुरगू गांव (पुराना नाम मुरू नगर) में 9 फरवरी 1806 ई. में एक साधारण गरीब किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम ठुइया खड़िया माता का नाम पेतो खड़िया है। तेलंगा खड़िया बाल अवस्था से ही वीर साहसी बालक थे। खड़िया भाषा में वीर साहसी को तेड बलंगा कहा जाता था। इसलिए तेलंगा को ग्रामीण तेड बलंगा ही पुकारते थे। बाद में वे तेड बलंगा से तेलंगा के नाम से प्रसिद्ध हो गए। उनका शरीर हट्ठा-कट्ठा रंग सांवला तथा उसकी ऊंचाई पांच फीट 8 इंच थी। 40 वर्ष की आयु में तेलंगा के माता-पिता ने उनका विवाह रतनी नामक एक खड़िया युवती से की। बाद में तेलंगा ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम जोगिया खड़िया था। तेलंगा के पिता ठुइया खड़िया छोटानागपुर के राजवंश नागवंशी महाराजा रातू गढ़ की ओर से मुरगू गांव में भंडारी के रूप में नियुक्त थे। वे मुरगू गांव के पाहन थे। उस समय देश के अन्य इलाकों की तरह इस क्षेत्र में भी अंग्रेज लोगों को मानसिक शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर टैक्स वसूल करते थे। इस दौरान छोटानागपुर के लोगों में एकता का आभाव था और वे आसानी से अंग्रेजों के फूट डालों शासन करो की नीति का शिकार हो जाते थे। अंग्रेजों के इसी अत्याचार शोषण को देख तेलंगा खड़िया से रहा नहीं गया और अग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन का बिगुल फूंका। तेलंगा खड़िया ने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए गांव-गांव जाकर लोगों को गोलबंद किया। वे लोगों को गोलबंद करने में जाति-धर्म से ऊपर उठकर काम करते थे। तेलंगा खड़िया जंग के मैदान में दुश्मनों के गोलियों का मुकाबला तीर-धनुष से करते थे। तेलंगा खड़िया द्वारा लोगों को गोलबंद करने की भनक जब अंग्रेज सरकार को लगी, तो अंग्रेज सरकार ने तेलंगा को पकड़ने का फरमान जारी कर दिया। इसी दौरान तेलंगा खड़िया बसिया थाना क्षेत्र के कुम्हारी गांव स्थित दूरी पंचायत का गठन कर रहे थे। जमीनदारों दलालों की दगाबाजी के कारण अंग्रेजों ने तेलंगा खड़िया को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद अंग्रेज उन्हें कोलकाता जेल में डाल दिया। जेल से छूटने के बाद वे मुरगू गांव पहुंचकर पुन: अंग्रेजों से लोहा लेने में जुट गए। दूसरे दिन 23 अप्रैल 1880 ई. को सुबह के 6 बजे वे सिसई स्थित अपने अखाड़ा पहुंचे थे। जहां उनके आंदोलन के सहयोगी पहले से मौजूद थे। अखाड़ा में तेलंगा खड़िया अपनी संस्कृति का प्रतीक सफेद झंडे नमन करने के लिए झुके ही थे कि अंग्रेजों के दलाल सिसई के बरगांव निवासी बोधन सिंह ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। तेलंगा का पार्थिव शरीर गुमला प्रखंड के सोसो गांव में दफन किया गया। यह स्थल आज तेलंगा टांड़ के नाम से प्रसिद्ध है।