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इब्नुल हसन बसरु थे किसानों मजदूरो के क्रांतिकारी योद्धा

7 वर्ष पहले
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सैयदइब्नुल हसन सही नाम था माले के दिवंगत नेता का। अलबत्ता जमुआ देवरी के ग्रामीण गरीबो, किसानों और मजदूरो के बीच बसरूजी के नाम से ही उनकी वास्तविक पहचान थी। बाद में माले ने उन्हें इब्नुल हसन बसरू नाम देकर माले के किसान एवं मजदूर संगठनों में लोकप्रिय करा दिया। 11 नवंबर 1945 को संथाल परगना के गोड्डा जिला स्थित आसनबनी गांव में जन्मे बशरू जी के पिता सैयद इजहार हुसैन जमुआ के मिर्जागंज स्थित लंगटा बाबा हाई स्कूल में शिक्षक थे। इसी लिहाज से बशरू ने इसी विद्यालय से मैट्रिक तक की शिक्षा हासिल की। बाद में उच्च शिक्षा के लिए पटना के बीएन कॉलेज में दाखिला लिया। जानकार बताते है कि इसी दौरान बशरू सीपीआई के बडे़ नेताओं के संपर्क मे आए। स्नातक करने के बाद वे मिर्जागंज गए और यही सीपीआई की नींव डाली। प्रसिद्ध ट्रेड यूनियन नेता और गिरिडीह के ही पूर्व विधायक और सीपीआई नेता ओमीलाल आजाद के साथ अपनी राजनीतिक पारी शुरू करने वाले बशरू ने जमुआ और देवरी प्रखंड को अपना कार्य क्षेत्र बनाया।

क्षेत्र के शोषित पीडि़त जनता किसान और मजदूर को सीपीआई के लाल झंडे की वे ताकत बनकर उभरे। नतीजतन बशरू के नेतृत्व में सीपीआई के उम्मीदवार बलदेव हाजरा ने वर्ष 1985 और 1990 का विस चुनाव लगातार दो बार जीता। सोवियत संघ के विघटन और भारत के सीपीआई में आए बिखराव के बाद भी बशरू ने जमुआ क्षेत्र में लाल झंडे की चमक बरकरार रखी। वर्ष 1995 के विस चुनाव में हार के बाद जमुआ में सीपीआई एक तरह से पूरी बिखर गई। माले नेता और बगोदर के विधायक महेंद्र सिंह के संपर्क में अाने के बाद बशरू माले में शामिल हो गए। बशरू का राजनीतिक कद और अनुभव को देखते हुए माले ने उन्हें केंद्रीय कमेटी का सदस्य बनाया।

इसे उनकी नेतृत्व क्षमता ही कहा जाएगा कि उन्होंने जमुआ में माले का जबरदस्त विस्तार कराया। यही कारण है कि माले यहां पिछले तीन विस चुनाव में दूसरे नंबर पर रहते रही है। किसानों की समस्या पर बेबाक टिप्पणी करने वाले बशरू पूरे देश में किसान आंदोलन काे विकसित करने के अंत तक भूमिका निभाते रहे। अखिल भारतीय किसान सभा, मजदूर सभा झारखंड मजदूर किसान समिति सरीखे मजदूर किसान संगठन के निर्माण में बशरू जी ने महती भूमिका निभाई।