कागजों पर चल रहा पंचायतों में कामकाज
पंचायतचुनाव हुए करीब पांच वर्ष बीतने को है। लेकिन जमुआ प्रखंड में कई पंचायतों में पंचायत सचिवालय का निर्माण नहीं हो पाया है। पंचायत भवन नहीं बनने से पंचायत सबंधी कार्य मुखिया के आवास पर चल रहा है। जिस कारण लोगों को पंचायतीराज का लाभ नहीं मिल पा रहा है। चुनाव के बाद पंचायतों के लिए आधारभूत संरचना तैयार की गई है। कुछ अधिकार पंचायत प्रतिनिधियों को मिलाा भी है। लेकिन क्षेत्र के विकास के लिए योजानाएं भी नहीं बन पा रही है। इसका कारण यह है कि पंचायतों में सचिवालयों का निर्माण कार्य अधूरा है। गांव के विकास के लिए जरुरी योजनाएं बनी। पर ज्यादातर पंचायत सचिवालय काम नहीं कर रहे हैं या फिर भवन बनकर तैयार नहीं हो पाया है। पर उसमें नियमित बैठने वाले कोई नहीं है। गिरिडीह जिला के जमुआ प्रखण्ड के 42 पंचायतों में से कई पंचायत सचिवालय का निर्माण आज भी आधा अधूरा है। जबकि कथित रुप से लागत से अधिक राशि की निकासी कर ली गई है। कई आधे अधूरे सचिवालय में आवारा पशुओं की शरण स्थली बना है। करोड़ों रुपए खर्च कर पंचायत सचिवालय को तैयार करवाया गया था। दरअसल यह भवन बहुद्देशीय थे। इनमें अलग-अलग प्रकार के दफ्तर बनना था। ताकि ग्रामीणों को छोटे से छोटे कार्यों के लिए प्रखण्ड मुख्यालय का चक्कर लगाना नहीं पड़े। लेकिन करोड़ों रुपए लगाकर इन भवनों का निर्माण तो करा दिया गया, पर ग्रामीणों को जो लाभ मिलना था नहीं मिल पा रहा है। पंचायतीराज में आज भी क्षेत्र की जनता ग्राम सभा की बैठकों से दूर रहना पड़ रहा है। केवल कुछ पंचायत के प्रतिनिधि ही मिलकर कागजों में सिमट कर रह गई है। ग्राम सभा की बैठकें भी कागजों पर ही चल रहा है। जिससे पंचायती राज का सपना अधूरा रह रहा है। अधिकांश योजनाओं का लाभ संपन्न वर्ग को ही मिल पा रहा है। अर्थिक रुप से कमजोर व्यक्ति पिछले पायदान पर खड़ा है। प्रतिनिधियों, मुखिया और ग्रामीणों की बैठक जमुआ प्रखण्ड के शायद ही किसी पंचयात में देखने को मिली हो।
{ पंचायत सचिवालय के आभाव में अधूरा है पंचायती राज का सपना
{ पंचायत सचिवालय नहीं बनने से आज भी लोगों को जाना पड़ता है प्रखंड कार्यालय