आरोपी काे बचाने के लिए निलंबन की फाइल दबा दी
सरकारीमहकमा का खेल निराला है चाहे इसके लिए किसी भी स्तर पर नजरअंदाजी करनी पड़े या लापरवाही लेकिन दोषी कर्मी हर हाल में बचना चाहिए। क्या कर्मचारी और क्या पदाधिकारी किसी ने भी शिथिलता बरतने में कोई कमी नहीं की। 11 माह तक अपने कार्य से अनुपस्थित रहे, लगभग चार माह जेल में बिताए लेकिन कार्रवाई के लिए नहीं खिसकी फाइल। आत्मसमर्पण के चार माह तक स्थापना शाखा में फाइल बाबू के टेबुल से साहब के टेबुल तक घूमती रही लेकिन निर्णय नहीं हो सका। फाइल कार्यालय से तब निकली जब जेल से छूटने के बाद कर्मी ने योगदान किया। इस बीच तो निलंबन की कार्रवाई हुई और हीं विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया की गई।
^पूरे मामले को देखने से प्रतीत होता कि दोषी कर्मी को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि नियमानुकूल जेल जाने के बाद हीं निलंबन की प्रक्रिया हो जानी चाहिए थी और विभागीय कार्रवाई के लिए प्रक्रिया शुरु होनी थी। सभी बिंदुओं को देखते हुए विधि सम्मत कार्रवाई के लिए उपायुक्त को लिखा जा रहा है।\\\'\\\' विधानचंद्रचौधरी, अपरसमाहर्ता जामताड़ा
मामला जिले के कुंडहित प्रखंड का है। पंचायत सचिव परेश चंद्र मंडल पर गत मार्च माह में सरकारी राशि गबन का आरोप लगा था। इस संदर्भ में कुंडहित थाना में कांड संख्या 22/15 दर्ज किया गया था। बीपीओ वाणीव्रत मिश्रा ने प्राथमिकी दर्ज करवाया था। यह प्राथमिकी मनरेगा के तहत मिट्टी-मोरम पथ निर्माण देबली मुख्य सड़क से शीला नदी तक से संबंधित था। दर्ज प्राथमिकी के अनुसार गलत मस्टर रॉल के सहारे 2 लाख 70 हजार 83 रुपए की फर्जी निकासी की थी। इस कांड में पंचायत सचिव के अलावे रोजगार सेवक स्वर्ण कुमार पुजहर, मेठ षष्टीपद बाउरी, मुखिया गणेश पुजहर, कनीय अभियंता आलोक कुमार दास को नामजद किया गया था।
बीडीआे और स्थापना शाखा के कर्मी जांच के घेरे में
जेलसे छूटने के बाद जब उक्त कर्मी ने योगदान किया तब जाकर बीडीओ ने इस संदर्भ में अग्रेतर कार्रवाई के लिए वरीय पदाधिकारी से मार्ग दर्शन की मांग की तो वह फाइल सामने आया। फाइल देखते ही अपर समाहर्ता ने नाराजगी जाहिर की और संबंधित विभाग के बाबू और बीडीओ की जमकर क्लास लगाई। इस मामले में स्थापना शाखा के कर्मी और बीडीओ की भूमिका को संदेहास्पद बताते हुए अग्रेतर कार्रवाई की प्रक्रिया प्रारंभ की है।
प्राथमिकी दर्ज होते ही ड्यूटी से हो गया था गायब, कोर्ट में किया था सरेंडर
प्राथमिकीदर्ज होने के बाद से उक्त कर्मी 14 मार्च से अपने कार्य से अनुपस्थित रहे। प्रखंड विकास पदाधिकारी की ओर से प्रपत्र गठित करने को लेकर पत्राचार 26 जून को किया गया था। तब से वह फाइल स्थापना शाखा में हीं घूम रही थी। किसी ने गंभीरता से उस पर ध्यान नहीं दिया। इस बीच वर्ष 2015 के 15 सितंबर को आरोपी पंचायत सचिव ने सीजेएम कोर्ट में आत्मसमर्पण किया और न्यायिक अभिरक्षा में मंडल कारा भेजा गया। इसी बीच 11 नबंवर को न्यायालय की ओर से वित्तीय अनियमितता की राशि कोषागार में जमा करवाने का आदेश दिया गया। इसी आलोक में मामले से संबंधित राशि 2 लाख 70 हजार 83 रुपए कोषागार में जमा करवाने के बाद कांड के आरोपी की जमानत कोर्ट से हुई।
{पौने तीन लाख रुपए की सरकारी राशि गबन के आरोप में पंचायत सचिव को जाना पड़ा था जेल
{ जेल जाने के बाद शुरू हुई थी विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया
{ जमानत के बाद योगदान देने कार्यालय पहुंचा तो मामले का हुआ खुलासा