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स्टेशनों पर सुनाई नहीं देती टन-टन की घंटी
बढ़तीतकनीक और आधुनिक युग में ट्रेन आने के पहले रेलवे स्टेशनों पर टन टन की धुन खोती जा रही है। शायद आने वाली पीढी़ के लिए तो ये गुजरे जमाने की धरोहर बन कर रह जाएंगी। ज्यादा नहीं रेलवे स्टेशनों पर आॅटो अनाउंसिंग प्रणाली के शुरू होने के करीब 10 वर्ष पहले तक लगभग सभी रेलवे स्टेशनों पर आपने एक चार फीट के खंभे के सहारे रेल पटरी की एक छोटी टुकड़ी लगी देखा होगा। जो अप एवं डाउन लाइन से होकर प्लेटफाॅर्म पर आने वाली ट्रेनों के पहले यात्रियों को संकेत दिया करती थी।
संभवतः आज भी ग्रेड सी और डी श्रेणी के रेलवे स्टेशनों पर यहां सूचना प्रणाली देखने को मिलेगी। लेकिन ग्रेड और बी के अलावा विशेष श्रेणी के रेलवे स्टेशनों पर तो ऑटोमेटिक प्रणाली के फेल होने पर ही इस मैनुअल प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है। जो अब कम ही होता है। चित्तरंजन रेलवे स्टेशन पर मौजूद यह प्रणाली अब आपात स्थिति में इस्तेमाल की जाती है। डाउन प्लेटफाॅर्म पर ट्रेन आने से पहले रेलवे के कर्मी दो बार टन टन बजाकर संकेत देते थे जबकि अप लाइन पर ट्रेन आने पर तीन बार टन टन टन बजाकर संकेत दिया जाता है। घंटी बजते ही लोगों को यकीन हो जाता था कि ट्रेन अब रही है। यात्री मुस्तैद हो जाते थे। इसके अलावा रेलवे स्टेशन या दूर से आने वाली ट्रेनों या रेलवे में कहीं भी आपात स्थिति होने पर भी इसी घंटे को लगातार 2 मिनट तक बजाकर इमरजेंसी का संकेत दिया जाता था। इसके अलावा थ्रू गाड़ियों को सिंगल लाइन में गुजारने के लिए ट्रेन ड्राइवर को रेलवे स्टेशन से टोकन फेंक कर दिया जाता था। जिससे चालक को यह संकेत मिलता था कि आगे रूट क्लियर है। टोकन नहीं मिलने पर ट्रेन चालक थोड़ी दूर पर गाड़ी रोक देते थे। यह मैनुअल उपकरण अब शोभा और धरोहर की वस्तु बनकर रह गयी है।