देवी का आगमन झूले पर प्रस्थान हाथी पर
25 सितंबर गुरुवार को कलश स्थापना के साथ शारदीय नवरात्र शुरू हो जाएगा। जो 3 अक्टूबर शुक्रवार को दशमी के पारण के साथ संपन्न होगा। दशमी तिथि का क्षय हो जाने से यह पक्ष 14 दिनों का हो गया है। कलश स्थापन प्रातः काल से लेकर दोपहर 12:19 बजे तक किया जा सकेगा। भारतीय संस्कृति में सात वार और नौ त्यौहार की कहावत भी प्रचलित है। परंतु आश्विन शुक्ल पक्ष वर्ष भर का सबसे प्रमुख त्योहारोत्सव वाला पखवारा माना जाता है। 30 सितंबर मंगलवार को दिन के 11:53 बजे के बाद सप्तमी तिथि लग जाएगी एवं रात 9:36 बजे से मूल नक्षत्र भी शुरू हो रहा है। अतः पूजा पंडालों में देवी की स्थापना के लिए 6:36 बजे से मुहूर्त बन रहा है। महाष्टमी व्रत का मान 2 अक्टूबर गुरुवार को होगा। पूजा पंडालों में संधि पूजा के लिए 2 अक्टूबर को दिन 8:13 बजे से लेकर 9:01 बजे तक का मुहूर्त बन रहा है। इसी दिन 9:02 मिनट के बाद महानवमी भी मनाई जाएगी। 3 अक्टूबर को प्रातः 6:34 बजे तक ही नवमी तिथि है अतः नवरात्र समाप्ति का हवन पूजन उसके पहले ही कर लेना चाहिए। उसके बाद दशमी तिथि लग जाएगी। जो अनुदया है। साथ ही नवरात्र व्रत का पारण भी 6:34 के बाद ही करना श्रेयस्कर है। शाम 6:01 बजे से श्रवण नक्षत्र भी लग जाएगी। अतः तारों के उदय समय दशमी तिथि और श्रवण नक्षत्र के योग में विजया दशमी का पुनीत पर्व मनाया जाएगा और प्रतिमा विसर्जित की जाएगी।
नवरात्र में आदिकाल से ही देवी के पृथ्वी पर आगमन और प्रस्थान करने को लेकर शुभाशुभ वाहन की सवारी और फल का वर्णन किया है। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित देवी के आगमन और गमन की कथा के बारे में पंडित पवन मिश्र (भूत) ने बताया कि इस वर्ष देवी का आगमन गुरूवार 25 अक्टूबर को कलश स्थापना के साथ हो रहा है। और प्रस्थान 3 अक्टूबर शुक्रवार को हो रहा है। अतः देवी का आगमन झूले पर हो रहा है जो प्रजा विग्रह का कारक माना जाता है। इसी तरह देवी का प्रस्थान हाथी पर हो रहा है जो सुवृष्टि और प्रजा के सुखों का कारक माना जाता है।
कहा गया है कि “”गुरू, शुक्र दोलायाम, प्रजा विग्रह करा, बुध शुक्र दिने यदि सा विजया, हस्ती वाहन रूढ़ा, सुवृष्टि प्रजा सुख करा’’।
विगत वर्षों की तुलना में इस बार भी मिहिजाम, रूपनारायणपुर चित्तरंजन को मिलाकर करीब 20 पूजा समितियां दुर्गाेत्सव की तैयारी में लगी है। एक दूसरे से बेहतर मंडप सज्जा करने क