खेती और हरियाली के नायक बने मुंशी मेहता
सूखे और भुखमरी की पहचान बने पलामू के सर्वाधिक पिछड़ा इलाका विश्रामपुर नपं के गोदरमा ग्राम के कृषक मुंशी मेहता कलम कुदाल के अनोखे सृजनहार हैं। दो दशक पहले इन्होंने अपनी कल्पना, कोशिश मेहनत, लगन की बदौलत गांव की तकदीर बदल डाली। गांव के निर्धन, लघु-सीमांत मेहनतकश किसानों को एकजुट कर बंजर खेतों को उपजाऊ बनाने में सफलता हासिल की।
इसमें उन्होंने देसी तकनीकी के साथ ही कृषि विज्ञान केंद्र चियांकी के वैज्ञानिकों की मदद ली। इससे गांव के बेकार पड़े लगभग 30 एकड़ बंजर खेत में मौसमी साग-सब्जी फल आदि की उपज होने लगी है। कृषक मुंशी मेहता ने किसानों को खरीफ-रबी, साग-सब्जी नकदी फसल की उपज के लिए किसानों को प्रेरित किया। रेनशेड एरिया कहे जानेवाले पलामू में मॉनसून की बारिश की निर्भरता कम करने के लिए उन्होंने किसानों के साथ मिलकर खुद कुएं खोदे। माइक्रोलिफ्ट एरिगेशन सिस्टम से सूखे खेतों को सिंचित करने में मदद ली। फलस्वरूप पांच वर्ष बीतते गांव खुशहाल हो उठा। खेतों में सालों भर हरियाली का राज कायम हो गया। वहीं हरियाली के नायक बने मुंशी मेहता का किशोरावस्था से हिलोरे ले रहा कवित्व भाव भी जागृत हो उठा। उन्होंने खाली समय में झारखंड समेत पलामू की खनिज संपदा, प्रकृति सौंदर्य के साथ शहीद सपूत नीलांबर-पीतांबर, युगंबर दीक्षित, प्रबोधन महतो, दयाशंकर मिश्र की वीरगाथा पर कविता की रचना कर डाली।
वर्ष 1999 में झारखंड भारती प्रदक्षिणा नाम से काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। गवईं शैली में रचित इन मौलिक कविताओं की सराहना ज्ञानपीठ पुरस्कार समिति से भी उन्हें मिली। उधर खेती में नई वैज्ञानिक तकनीक के साथ कृषि विज्ञान केंद्र से समय-समय पर मिल रहे सहयोग की बदौलत कवि कृषक मुंशी मेहता जिला से लेकर राज्य स्तरीय कृषि प्रदर्शनी में बागवानी मौसमी उपज साग-सब्जी फल उत्पादन आदि के लिए लगातार पुरस्कृत होते रहे। इस उत्साह वर्धन में वह कालांतर गांव से बाहर के मेहनतकश लघु कृषकों को भी साथी बनाए रहे। मौसमी खेती बागवानी से मिल रहे मुनाफा उससे आयी किसानों में संपन्नता से उनकी पूरे इलाके में लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। इधर सूखे की मार से विपन्नता के कारण गोदरमा को सतुआडीह जाने वाला कलंक भी घुल गया।
कृषक मुंशी मेहता।