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मेडिकल कॉलेज के लिए नहीं मिली जमीन

7 वर्ष पहले
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पलामूमें मेडिकल कॉलेज नहीं खुल पाने के पीछे जमीन की अनुपलब्धता एक अहम कारण रहा है। कहा जाये तो जमीन नहीं मिल पाना ही मेडिकल कॉलेज के रास्ते में रोड़ा बना है। यही कारण है कि कॉलेज खोले जाने की स्वीकृति मिलने के 6 साल बाद भी पलामू आज भी वहीं खड़ा है।भूमि की अनुपलब्धता के साथ ही इस मामले में सरकार और स्वास्थ्य विभाग के बीच तालमेल का अभाव भी रहा है। जहां सरकार ने कैबिनेट से प्रावधान के मुताबिक 100 सीट के मेडिकल कॉलेज की स्वीकृत दी है, वहीं स्वास्थ्य विभाग पीपीपी के माध्यम से 300 सीट का मेडिकल कॉलेज बनवाने की ईच्छा रखता है। हालांकि सरकार ने स्वास्थ्य विभाग के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

कॉलेज के लिए मिल चुके हैं 4 करोड़

पलामू में मेडिकल कॉलेज खोले जाने की स्वीकृति मिलने के बाद इसके निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने के उद्देश्य से सरकार ने तत्काल ही 4 करोड़ रुपए भी मुहैया करा दिये थे। 2008 में पलामू में 100 बेड के अस्पताल की स्वीकृत के साथ ही यह राशि भी निर्गत कर दी गयी थी।

रिजनलअस्पताल में ही शुरू करने की मांग

कैबिनेटद्वारा स्वीकृत के बाद भी मेडिकल कॉलेज खोलने में हो रही देरी को देखते हुए कई छात्र संगठनों तथा सामाजिक संगठनों ने भूमि और भवन तथा अन्य प्रक्रियाओं में मेडिकल कॉलेज को उलझता देख तात्कालिक रूप से इसे रीजनल अस्पताल (सदर अस्पताल) में ही चालू करने की मांग की है। उनका कहना है कि धनबाद और जमशेदपुर में भी मेडिकल कॉलेज बनने से पहले इसे पूर्व के अस्पतालों में ही शुरू किया गया था।

कारगर पहल का अभाव

प्रक्रिया की बात करें तो सरकार ने केंद्र के साथ एमओयू भी कर लिया है। लेकिन इसके बाद भी बात वहीं की वहीं रुकी हुई है। क्योंकि इस मामले में तो विभाग और ही जिला प्रशासन या क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों द्वारा कोई कारगर पहल की जा रही है। अनुसूचित जाति जनजाति छात्र संर्घष मोर्चा के अध्यक्ष उदय राम का कहना है कि मेडिकल कॉलेज के प्रति इस तरह की उदासीनता चिंताजनक है। यह अफसोस की बात है कि इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद भी यहां के जनप्रतिनिधि इसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।