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भितरघात में लगे लोगों का खेल हो रहा है। शायद

7 वर्ष पहले
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भितरघात में लगे लोगों का खेल हो रहा है। शायद आगे भी होगा। होता रहा है। लगभग छः दशक पुराना इतिहास है इस खेल का। इस खेल के जनक कहें या नायक-खलनायक, एक थे केबी सहाय और दूसरे थे महेश प्रसाद सिंह। दोनों श्री बाबू मंत्रिमंडल के कैबिनेट मंत्री। दोनों ने एक दूसरे को हराने का काम किया। कोई कसर बाकी नहीं रखी केबी सहाय थे राजस्व मंत्री,महेश प्रसाद सिंह थे परिवहन मंत्री। दोनों ही हार गए १९५७ का चुनाव। गिरिडीह से केबी सहाय और मुजफ्फरपुर से महेश प्रसाद सिंह। आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ। केबी सहाय का आरोप था मुझे हराने के लिए महेश प्रसाद सिंह ने परिवहन विभाग की बसों का इस्तेमाल मेरे क्षेत्र में किया। महेश प्रसाद सिंह का आरोप था केबी सहाय ने मुझे हराने के लिए मेरे विरुद्ध खड़े अपनी जाति के महामाया प्रसाद सिन्हा ( प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ) को धनबल से सहयोग किया। मामला दिल्ली पहुंचा। कांग्रेस आलाकमान ने इन आरोपों की जांच के लिए श्री पात्स्कर को पटना भेजा। दोनों के आरोप सही पाए गए। आलाकमान ने दोनों को 1962 तक कोई भी चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी। हालांकि, बाद में पाबंदी हटा ली गई पर इस घटना ने कांग्रेस पार्टी में दरार पैदा कर दी और सत्ता पर दावेदारी के लिए जो गुटबाजी शुरू हुई उसकी परिणति पार्टी को विभाजन तक ले गई। केबी सहाय ने श्री बाबू पर जातिवाद करने और महेश प्रसाद सिंह की तरफदारी का आरोप लगाया। जेपी (लोकनायक जयप्रकाश नारायण) ने केबी सहाय के बचाव में अखबारों में बयान दिए। श्री बाबू ने अपनी सफाई दी। केबी ने अपनी टिप्पणी में कहा श्री बाबू की असली नाराजगी की वजह भू-हदबंदी कानून है और 1957 में टिकट बंटबारे में उनके तरीके का मेरे द्वारा किया गया विरोध। किसी किसी रूप में आज भी यह सब होता हुआ प्रायः सभी दलों में क्या दिखता नहीं है? (जारी)