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ऐसे बनेगा दुनिया बदलने वाला भारत

5 वर्ष पहले
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प्रीतीश नंदी

वरिष्ठपत्रकार और फिल्म निर्माता

हर बारजब मैं सोचता हूं कि नरेंद्र मोदी गाड़ी चूकने ही वाले हैं, वे मुझे चौंका देते हैं। वे मुुझे और भी इसलिए चौंकाते हैं, क्योंकि मैं भक्त नहीं हूं, मैं नहीं मानता कि भारत दुनिया का सबसे सहिष्णु राष्ट्र है, मुझे मार्क ज़करबर्ग भी पसंद नहीं हैं, जो हर किसी को मुफ्त इंटरनेट देने के बहाने से फ्री बेसिक्स को भारत में घुसाने की कोशिश में लगे थे और शाकाहारी जानवरों से प्यार होने के बावजूद मैं नहीं मानता कि सरकार को लोगों की खान-पान की आदतों में हस्तक्षेप करना चाहिए। कोई भी बात थोपी जाती है तो वह अपना विद्रोह खुद ही खड़ा कर लेती है (यह मैंने नहीं, हेगेल ने कहा था)।

मोदी खास स्टार्टअप वाले व्यक्ति हैं। उनके पास कुछ चतुराईभरे आइडिया हैं, जिन्हें वे जुनून के साथ अभिव्यक्त करते हैं। किंतु कई स्टार्टअप वाले व्यक्तियों की तरह वे भी ऐसी टीम नहीं जुटा पाए हैं, जो उन विचारों, आइडिया को आगे ले जाए। इसकी बजाय उन्होंने अजीब-अजीब तरह के लोगों के समूह को आकर्षित किया है, जो उनके साथ जुड़े होने का दावा करते हैं और फिर सुनियोजित तरीके से उनकी हर चतुर पहल को बर्बाद कर देते हैं। वे ऐेसे लोगों से दूरी बनाने का प्रयास करते हैं, लेकिन वे बराबर सुर्खियों में आते रहते हैं, उनके नाम पर अपना एजेंडा बेचने की कोशिश करते हैं।

इस बीच, मोदी को यह अहसास हो गया है (और मेरे हिसाब से यह बहुत बुद्धिमानी भरी सोच है) कि चुनाव अभियान में किए वादे तो सिर्फ चुनावी वादे हैं। देश पर शासन करना बिल्कुल अलग ही बात है। एक के लिए दूसरे के साथ समझौता किए बिना दोनों को एकसाथ अमल में लाना संभव नहीं है। अत: उन्होंने अपनी पसंद तय कर ली है। उन्होंने शासन के अधिक महत्वपूर्ण काम पर ध्यान केंद्रित किया है। प्रधानमंत्री के रूप में यह एकदम सही फैसला है। अब उन्हें हमारे लिए यूपीए-2 सरकार द्वारा किए नुकसान की भरपाई करनी है और वे सुधार लाने हैं, जिनकी इस देश को सख्त जरूरत है। यह हमारे प्रति उनका दायित्व है। अब पुराने बदले निकालने का वक्त गुजर चुका है। और अब तो हमें नई चिंताएं चाहिए ही नहीं।

लाहौर में उनका अनियोजित पड़ाव अद्‌भुत रूप से उथल-पुथल पैदा करने वाली पहल थी। उन्होंने उस देश के नेता से सीधे संपर्क स्थापित करने के लिए पूरी व्यवस्था को दरकिनार कर दिया, जिसे हम दुश्मन देश समझते हैं। वे जानते थे कि उनकी इस पहल के कई आलोचक होंगे (उनकी अपनी पार्टी में भी), जो उनके नाकाम होने पर टूट पड़ने का इंतजार कर रहे होंगे। हालांकि, उन्होंने जोखिम लिया और इतिहास उनकी इस पहल को याद रखेगा, क्योंकि यही मोदी थे, जो चुनावी अभियान में युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नज़र आते थे। आज उनमें साहस है कि वे समस्याओं को अलग तरह से देख रहे हैं और नए समाधान खोज रहे हैं।

यह मोदी की नई ताकत है। जोखिम लेने की क्षमता, पुराने आइडिया पर फिर गौर करना और ऐसे नए समाधान खोजना, जो प्राय: उसके खिलाफ होते हैं, जिनकी पैरवी वे पूर्व में कर चुके होते हैं। निरंतरता संकुचित दिमागों का अंधविश्वास होता है( हां, एमर्सन ने यह कहा था)। खुदके कहे के विपरीत रुख अपनाने में बहुत हिम्मत लगती है। मोदी ने ऐसा करने की शुरुआत कर दी है। उन्हें अहसास हो गया कि स्टार्टअप बिज़नेस में उनके कोई दुश्मन नहीं हैं, सिर्फ नाकाम हुए प्रयासों को साहसपूर्वक फिर ध्यान देने की जरूरत होगी।

पिछले दिनों उन्होंने जो किया, वह फिर चतुराईभरा कदम था। महात्मा के जमाने से सारे नेताओं ने दो परंपरागत समूहों को पुचकारा है। एक तरफ फैट केट उद्योगपति और दूसरी तरफ गरीबों का विशाल वोट बैंक। इन्हें पुचकारने की बजाय मोदी ने स्टार्टअप इंडिया का चुनाव एक नए राजनीतिक वर्ग के नजदीक जाने के लिए किया। यह भविष्य का मतदाता वर्ग है। स्टार्टअप्स यानी नई कंपनियों के लिए फायदों की उनकी घोषणाएं और उनका यह वादा कि सरकार बिज़नेस के उन मामलों में अपने नाक नहीं घुसाएगी, जो इसका काम नहीं है, ये दोनों बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। नौकरी के लिए दर-दर भटकने वाले युवा, उम्मीद है अपना खोया आत्मविश्वास हासिल करेंगे और सामने आकर दूसरों के लिए नई नौकरियां निर्मित करेंगे। पीएचडी वालों को सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन नहीं देने होंगे। प्रतिभा और कौशल को अंतत: सम्मान और आदर मिलेगा। अभी युवा इसलिए नौकरियां खोजते हैं, क्योंकि उन्हें अपना बिज़नेस खोलने में डर लगता है। वे जानते हैं कि भ्रष्ट व्यवस्था से निपटना कितना कठिन है। हर कहीं, हर व्यक्ति उन्हें परेशान करने के लिए बैठा है। सफल हो जाए तो वसूली करने और नाकाम होने पर सजा देने के लिए तैयार बैठा है। यह सिर्फ इंटरनेट बिज़नेस की बात नहीं है, भारत में सारे व्यवसायों के लिए यह सही है। हर कोई यह जानता है।

इस सबके बावजूद हम अद्‌भुत लोग हैं। हम सबसे कठिन परिस्थितियों में कामयाब होकर दिखाते हैं। मैं जो दो व्यवसाय जानता हूं, वे इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं- मीडिया और मनोरंजन है। हमने सारी विपरीत स्थितियों के बावजूद भीषण रूप से स्वतंत्र मीडिया खड़ा किया है। आपातकाल के अत्याचारों ने हमें हताश नहीं किया। वास्तव में इन अनुभवों से हम समृद्ध हुए। इसने हमें राजनीति की नाकामयाबियों से लड़ने की और ताकत दी। मनोरंजन का जहां तक सवाल है, इसी ने तो भारत को एकजुट रखा है। हम दुनिया में सर्वाधिक फिल्में बनाते हैं। हम सबसे ज्यादा टिकट बेचते हैं। हम सर्वाधिक वीडियो डाउनलोड करते हैं। जहां तक कौशल और टेक्नोलॉजी का सवाल है, हम दुनिया में सर्वश्रेष्ठ के बराबर हैं। हमने शून्य में से दुनिया का सर्वाधिक रोमांचक मनोरंजन उद्योग खड़ा किया, जो सबसे तेज गति से बढ़ रहा है। यह कुटीर उद्योग की तरह शुरू हुआ था, कहीं से कोई मदद नहीं। फिर भी यह लाखों लोगों को आजीविका मुहैया कराता है। उनमें से कई तो पढ़े-लिखे प्रशिक्षित भी नहीं होते। दुनिया के लिए यह हमारी सॉफ्ट पावर की अद्‌भुत बानगी है।

ये वास्तव में मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। वक्त गया है कि हम औद्योगिक क्रांति के कालबाह्य और इतिहास में दफ़्न हो चुके सपनों का पीछा करना छोड़ दें और ऐसे बिज़नेस पर फोकस करें। तब आपको सच्चा स्टार्टअप इंडिया देखने को मिलेगा। वह भारत जो दुनिया के पीछे चलने की बजाय उसे बदल देगा।

pritishnandy@gmail.com(येलेखक के अपने विचार हैं।)

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