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वीकली इकाेनॉमी

6 वर्ष पहले
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आर. जगन्नाथन

विनिवेश : क्या एलआईसी सरकार की बैंकर है

आपने यहकहानी तो सुनी ही होगी। दो ठेले वाले सड़क किनारे खड़े होकर केले और मूंगफली बेच रहे थे, लेकिन उन्हें पर्याप्त ग्राहकी नहीं मिल रही थी दोपहर में मूंगफली वाले को भूख लगती है। वह दोपहर तक हुई मामूली कमाई में से कुछ पैसे देकर साथ में खड़े ठेले वाले से केले खरीद लेता है। फि‍र मूंगफली वाला भी उतने ही पैसे देकर उससे केले खरीदता है। दोनों कई बार ऐसा करते हैं। शाम होते-होते दोनों का माल खत्म हो जाता है। आप क्या सोचते हैं क्या इससे दोनों ठेले वालों की अच्छी कमाई हुई होगी?

सरकार का विनिवेश कार्यक्रम यानी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के शेयर निवेशकों को बेचना ठीक इन दोनों ठेले वालों की तरह है जो अपना माल एक-दूसरे को बेचते हैं और आखिर में दोनों की बेहद मामूली कमाई होती है। हाल में सरकार ने कोल इंडिया लिमिटेड के 22,557 करोड़ रुपए मूल्य के शेयर बेचे। लेकिन इसमें लगभग आधे शेयर भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने खरीदे हैं जो सरकार की ही 100 फीसदी हिस्सेदारी वाला उपक्रम है।

यह विनिवेश नहीं, बल्कि पैसे का सिर्फ एक जेब से दूसरी जेब में जाना है। इससे पहले भी एलआईसी विनिवेश की हर बड़ी कोशिश में शेयर खरीद चुकी है। उसने बैंकों के शेयरों में भी ऐसे समय निवेश किया है जब सरकार ऐसा कर पाने में विफल रही। ओएनजीसी समेत कुछ और बड़े इश्यू इस वित्त वर्ष की समाप्ति से पहले आने हैं। हम मान सकते हैं कि इन कंपनियों को निजी निवेशक पर्याप्त संख्या में नहीं मिले तो इस बार भी एलआईसी, एसबीआई और अन्य कैश रिच कंपनियों को शेयर खरीदने के लिए वित्त मंत्रालय से फोन सकता है। बेशक, हम जानते हैं कि सरकार ऐसा क्यों करती है।

सरकार को टैक्स के रूप में मि‍लने वाले राजस्व की रफ्तार सुस्त है और विनिवेश से जुटाए हर एक रुपए से राजकोषीय घाटे को कम करने में मदद मिलती है। लेकिन इसके लिए एलआईसी की नकदी में गोता लगाना बीमारी का इलाज नहीं है। वर्ष 2014-15 के लि‍ए सरकार का राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 5,31,177 करोड़ रुपए है, लेकिन यह दिसंबर 2014 में ही इससे पार निकल चुका है। यानी राजकोषीय घाटे को इसी स्तर पर बनाए रखने के लि‍ए सरकार को बाकी बचे तीन महीनों में शेयर बिक्री और स्पेक्ट्रम नीलामी पर निर्भर रहना होगा। संभवत: इसीलिए एनडीए सरकार ने चालू वित्त वर्ष के आखिरी महीने में पैसे जुटाने के लिए 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के लि‍ए 2,100 मेगाहर्ट्ज बैंड में 3,705 करोड़ रुपए प्रति‍ मेगाहर्ट्ज रिजर्व प्राइस तय की है। यह ट्राई की सिफारिश (2,720 करोड़ रुपए) से 36 फीसदी अधि‍क है। इससे पहले कैबिनेट 800 मेगाहर्ट्ज बैंड में ऑल-इंडि‍या स्पेक्ट्रम के लि‍ए 3,646 करोड़ रुपए, 900 मेगाहर्ट्ज बैंड में 3,908 करोड़ रुपए और 1,800 मेगाहर्ट्ज बैंड में 2,191 करोड़ रुपए प्रति मेगाहर्ट्ज रिजर्व प्राइस को मंजूरी दी थी। स्पेक्ट्रम नीलामी 4 मार्च से शुरू होगी। यदि यह नीलामी सफल रही तो सरकार हर साल 20,000 से 25,000 करोड़ रुपए कमा सकेगी और आने वाले वर्षों में 80,000 से एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा कमाएगी।

स्पेक्ट्रम की बिक्री एक अलग मसला है, लेकिन शेयर बिक्री में एलआईसी के पैसे का उपयोग किया जाना सिद्धांतत: गलत है। बजट घाटे की पूर्ति के लि‍ए आप यूं ही कि‍सी अन्य का पैसा इस्तेमाल नहीं कर सकते। हालांकि एलआईसी बाद में इन शेयरों को बेच सकती है और यहां तक कि मुनाफा भी कमा सकती है। लेकिन शेयरों की कीमत घटने का जोखिम भी बराबर रहेगा। यह ऐसा जोखिम नहीं है जो एलआईसी पालिसीधारकों के पैसे जरिये उठाया जाए।

क्या इससे बचने का कोई तरीका है? हां, है। कोल इंडिया के शेयर एक बार में बड़ी मात्रा में बेचना हमेशा समस्या बना रहेगा। लेकिन कौन कहता है कि सारे शेयर एक दिन में ही बेच दिए जाएं? स्पष्ट है कि सरकार को सारे शेयर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में साल भर में बेचने चाहिए। कि साल के आखिर में जल्दबाजी में, वह भी एक बार में। सरकार इससे निपटने के लि‍ए अगले साल 100 फीसदी सरकार की हिस्सेदारी वाली एक कंपनी बना सकती है। पूरे साल में बेचे जाने वाले शेयर बजट के तत्काल बाद इस कंपनी को ट्रांसफर किए जा सकते हैं। यह कंपनी पूरे साल में सुविधाजनक समय पर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में इन शेयरों की बिक्री कर सकती है। इससे बाजार को भी झटका नहीं लगेगा और जब कभी बाजार चढ़ता है तो इन शेयरों की अच्छी कीमत भी मिल सकती है। जब सारे शेयर बिक जाएं तो यह कंपनी प्राप्त रकम सरकार को दे सकती है। इस तरह, इस काम के लिए एलआईसी को पॉलिसीधारकों के धन के साथ जोखिम उठाने के लिए क्यों कहा जाए जब एक अन्य सरकारी कंपनी यह काम कर सकती है?

rjagannathan@dbcorp.in

-लेखक आर्थिक मामलों के वरिष्ठपत्रकार,‘फोर्ब्स इंडिया’के एडिटर-इन-चीफहैं।