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पकड़े गए हैं कई बच्चे

7 वर्ष पहले
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पकड़े गए हैं कई बच्चे

शहरमें पॉकेटमारी की कई घटनाओं में महिलाओं और बच्चें पकड़े जा चुके है। पुलिस ऐसे लोगों पर नजर रख रही है। कई को जेल भी भेजा जा चुका है।

प्रभातकुमार सिंह, एसएसपी

पहचान से डरते हैं

जेबकतरोंको सिर्फ पहचाने जाने का डर सताता रहता है। गुंडागर्दी के धंधे में जो क्रिमिनल जितना बदनाम होता है, उसकी दुकान उतनी ही चलती है। पाकेटमारी के धंधे में जो पाकेटमार एक बार पहचान लिया जाता है, उसका धंधा लगभग खत्म ही माना जाता हैं। क्योंकि घटना के बाद पुलिस सीधे उसे ही गिरफ्तार करती है।

शहर में कई गिरोह सक्रिय हैं। आपसी विवाद से बचने के लिए इन्होंने एरिया बांट रखा है। कोई गिरोह मेन रोड, तो कोई कांटाटोली, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन के आसपास रहते हैं। सभी गिरोह अपने-अपने एरिया में ही लोगों को शिकार बनाते हैं। दूसरे के एरिया में पॉकेटमारी करने पर कई बार आपस में लड़ाई भी होती है।

ग्रुप में करते हैं पॉकेटमारी

पॉकेटमारअकेले जेब काटने का काम नहीं करते। ये लोग ग्रुप में रहकर ही घटना को अंजाम देते हैं। अकेले में पकड़े जाने का डर अधिक होता है, इसके अलावा जेब काटना भी मुश्किल होता है। जबकि, ग्रुप में ये लोग शिकार को बातों में फंसाकर अपना काम कर लेते हैं। जेब काटते ही अपने दूसरे साथी को पर्स अन्य सामान थमा देते हैं। ऐसे में पॉकेटमारी का शिकार हुए व्यक्ति से वह निडर होकर बात करता है। अगर तलाशी लेने की बात होती है, तो आनाकानी करते हुए वह तैयार हो जाता है। जैसे ही उसके पास से जेब से निकाला गया सामान या पर्स बरामद नहीं होता, उल्टे पॉकेटमार ही भुक्तभोगी व्यक्ति पर चढ़ जाता है।

पहले जहां जींस पहने व्यक्ति की जेब काटना काफी मुश्किल होता था, वहीं अब आसान और ढीली जेबों के फैशन ने इनका काम आसान कर दिया है।

फैशन ने काम आसान किया

पॉकेटमारी गिरोह कम उम्र के बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं। पुराने पॉकेटमार पहले इन्हें अपने साथ रखकर पॉकेटमारी का तरीका बताते हैं। ट्रेंड होने के बाद ये बच्चे भीड़ में आसानी से काम को अंजाम दे देते हैं। कभी कभार पकड़े जाने पर गिरोह के सदस्य ही बच्चों को खुद घेर कर बच्चा है, छोड़ दीजिए कहने लगते हैं। अगर भीड़ अधिक आक्रोशित है, तो साथी सदस्य ही गुस्सा दिखाते हुए एक-दो थप्पड़ लगा देते हैं। इसके उपरांत भीड़ से बचा कर भगा देते हैं। वहीं, कई गिरोह में लड़क