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उदारवादी नौकरशाही व्यवस्था ने हिंदी को किया उपेक्षित
सास्कृतिकसंस्था कला संगम ने हिंदी दिवस के अवसर पर प्रख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक परिचर्चा का आयोजन रविवार को अधिवक्ता संघ भवन में किया गया। कार्यक्रम में पूर्व मंत्री सह संस्था के संरक्षक चन्द्रमोहन प्रसाद, पूर्व विधायक लक्ष्मण स्वर्णकार, ज्योतिंद्र प्रसाद, प्रो एचएन देव, संस्था के सचिव सतीश कुंदन, विनय बक्शी, महेश अमन, मीडिया प्रभारी अंजनी कुमार सिन्हा, सुभाष सिन्हा समेत कई लोग उपस्थित हुए।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने हिंदी की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की। वक्ताओं ने कहा कि एक साजिश के तहत शासक वर्ग का और अफसर शाही व्यवस्था के कारण आज हिंदी की उपेक्षा की जा रही है। जबकि हिंदी विश्व में बोली जाने वाली तिसरी सबसे बडी भाषा है। इसके लिए लोगों को अपने स्तर से सुधार लाना होगा। वक्ताओं ने कहा कि वे अंग्रेजी के विरोधी नहीं है पर एक साजिश के तहत शिक्षा व्यवस्था में अंग्रेजी तंत्र हावी है हम पिछड़ते जा रहे हैं। बच्चों को देश के संस्कृति से दूर कर पूरी तरह से अंग्रेजी का ज्ञान दिया जा रहा हे। आज के बच्चे गाय का मतलब नहीं समझते हैं बल्कि उन्हें काउ समझ में आता है। ये हिन्दी भाषियों का नैतिक पतन है।
िहंदीको बचाने के िलए आगे आना होगा
कार्यक्रमको संबोधित करते हुए पूर्व मंत्री चन्द्रमोहन प्रसाद ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद की लिखी रचना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस समय थी। जिसमें नमक का दारोगा जैसे साहित्य आज के दौर में बिना परदे के देखा जा सकता है। श्री प्रसाद ने कहा कि हिंदी को बचाने के लिए और आगे बढाने के लिए सबको मिलकर आगे आना होगा। संस्था के सचिव सतीश कुंदन ने कहा कि इस नौकरशाही व्यवस्था में हिंदी का पतन हो रहा है। जबकि हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है। उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचंद कई वर्ष पूर्व लिखी गई साहित्य में से एक कफन नामक कहानी आज भी इसलिए प्रासंगिक है कि उस साहित्य में प|ी के कफन के लिए चंदा कर भूख के कारण खा जाता है। वही स्थिति आज भी है जहां अंग्रेजी की भूख हिंदी को खा रही है। उन्होंने कहा कि उदारीकरण से सबसे ज्यादा बुरा प्रभाव हिंदी पर पड़ा है। शिक्षा जगत में विदेशी किताबों में और हिन्दी साहित्यकारों का अंग्रेजी में गलत तरीके से अनुवाद किया जा रहा है। साथ ही सरकारी विभाग, न्यायालय में भी हिंदी की उपेक्षा की जाती है। उन्होंने