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हर दिन नई ऊर्जा से लबरेज हो रहे बच्चे

5 वर्ष पहले
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झारखंड में \\\"बोलना ही गीत और चलना ही नृत्य\\\' कहा जाता है। इसकी जीवंत मिसाल इन दिनों बना है कल्चर हब बनने जा रहा रांची का आड्रे हाउस। शास्त्रीय नृत्य-संगीत की युवा हस्ताक्षर गार्गी मलकानी के प्रयास से कला-संस्कृति विभाग की नेक पहल इसका सबब बनी है। 13 दिनों से बच्चे और किशोर-किशोरियां परंपरागत और आधुनिक कला के कई आयामों से वाकिफ हो रहे हैं। गुनगुना रहे हैं, तो थिरक रहे हैं। हंसा रहे हैं, तो रुला रहे हैं। उन्हें ट्रेंड करने के लिए देश के विशेषज्ञ कला गुरु की उपस्थिति सभागार को गौरवान्वित कर रही है। कल तक जहां माइम के पर्याय कहे जाने वाले निरंजन गोस्वामी वर्कशॉप में रहे, वहीं आजकल पंडित मुन्ना शुक्ला कथक के शास्त्रीय रियाज कराने में बच्चों के पसीने बहा रहे हैं। शनिवार की संध्या उन्हें 3 घंटे बच्चों के साथ बिताए। गार्गी के निर्देशन में बच्चों ने नृत्य नाटिका मेघदूत का अभ्यास भी किया। वर्कशाप के सहभागियों से बातचीत में एहसास पुख्ता हुआ कि नृत्य कार्यशाला में हर दिन 35 बच्चे नई ताजगी और ऊर्जा से लबरेज हो रहे हैं।

लोक नृत्य का ठाठ ही अलग है। कथक का मिश्रण जान डाल देता है, जो सीखा। आस्था

नृत्य के कई रूप जाने। सबसे बड़ा लाभ हुआ, माइम से एकल भव जानना। अमिषा

चार साल की उम्र से कथक कर रही हूं। पर यहां ढेरों नई बारीकियां सींखी। अंचिता

पाइका और झूमर सीख रही हूं। कथक भी। लोक और शास्त्रीय नृत्य में मूल अंतर भाव का है। ज्योति

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