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माननीयों को मिलेगा सम्मान, पर मनमानी की इजाजत नहीं मिलेगी

5 वर्ष पहले
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कानून विधायिका नहीं कार्यपालिका बना रही है

विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने कहा

मुख्यमंत्रीरघुवर दास ने सीधा संदेश दिया है कि कोई माननीय हो गए, इसका मतलब नहीं कि वह जो चाहे करें। उन्हें मनमानी की इजाजत नहीं मिलेगी। हां यह बात भी सही है कि कार्यपालिका में बैठे लोगों को भी माननीयों का सम्मान करना चाहिए। उनकी भावनाओं का ख्याल रखना होगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि वाद-विवाद के साथ संवाद भी हो। राज्य हित के मुद्दों को पक्ष-विपक्ष में नहीं बांटा जाना चाहिए। विधानसभा के काम में आईटी का अधिकाधिक उपयोग होना चाहिए। शालीनता से अपनी बात रखने वाले विधायकों को भी प्रमुखता मिलनी चाहिए। ऐसा नहीं कि सदन में जोर-शोर से चिल्लाने वाले ही प्रमुखता पायें। उन्होंने कहा कि 13 महीने में उन्होंने टीम वर्क से काम किया है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि सरकार जनहित के मुद्दों को गंभीरता से लेगी। उस पर तत्परता से अमल करेगी। दास बुधवार को विधायकों के लिए आयोजित एक दिवसीय विधायी प्रशिक्षण शिविर को संबोधित कर रहे थे। स्पीकर दिनेश उरांव की अध्यक्षता में आयोजित इस शिविर में लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप, जी सी मलहोत्रा विशेष रूप से उपस्थित थे।इस अवसर पर संसदीय कार्यमंत्री सरयू राय ने विषय प्रवेश कराया। स्वागत भाषण राधाकृष्ण किशोर ने दिया।।

सर्वेपर गौर करें विधायक : खरे

बजटक्या, कैसे बनता है, संवैधानिक प्रावधान क्या है और बजट की चुनौतियां क्या है, वित्त विभाग के प्रधान सचिव अमित खरे ने इसकी विस्तार से व्याख्या की। इस क्रम में उन्होंने विधायकों से आग्रह किया कि वह बजट पेश होने से पूर्व सदन में रखे जानेवाले इकॉनोमिक सर्वे पर भी गौर करें।

विरंची नारायण और शिवपूजन मेहता-प्रश्न के अनुरूप सरकार का जवाब नहीं मिलता, दूसरी बार हम पूछ नहीं सकते।

इसमेंस्पीकर का संरक्षण जरूरी है।

कुणालषाडंगी-अभिभाषण पर चर्चा के दौरान जो विषय उठता है,सरकार द्वारा कृत कार्रवाई की जानकारी नहीं दी जाती।

जानकारीप्राप्त करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है।

स्टीफनमरांडी-धन्यवाद प्रस्ताव पर राज्यपाल का जो थैंक्स आता है उसे कब रखा जाए।

थैंक्सआने के जस्ट बाद।

राजसिन्हा-शून्यकाल से सवाल खड़ा करना सबसे आसान है। पर इसकी गंभीरता कितनी हो।

अत्यधिकमहत्व के घटनापरक विषय को ही इसके माध्यम से उठाया जा सकता है।

निर्भयशाहाबादी-गोल-मटोल जवाब से जब विधायक संतुष्ट नहीं हों तो क्या करें

यहविशेषाधिकार का भी प्रश्न बनाया जा सकता है।

अनंतओझा-क्या सदन की कार्यवाही बाधित करने की कोई समय सीमा तय है

असंवैधानिकतरीके से कोई सदन को बाधित नहीं कर सकता।

राधाकृष्णकिशोर-विधानसभा की समितियों की रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं होती। अगर सरकार बहुमत में नहीं हो तो स्पीकर सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर सकते।

सरकारके विश्वास और अविश्वास में रहने का विषय सदन में ही तय होना चाहिए। स्पीकर द्वारा स्थगित नहीं किया जाना चाहिए।

प्रतिपक्ष के नेता हेमंत सोरेन ने कई सवाल खड़े किये। उन्होंने कहा कि सच यही है कि आज विधायिका सबसे कमजोर स्थिति में है। इसकी गरिमा बचाने में हम सफल नहीं हो पा रहे। शीत सत्र में सरकार ने एक विधेयक रखा। स्पीकर के आदेश से उसे प्रवर समिति को भेज दिया गया। फिर संसदीय कार्यमंत्री के इस आश्वासन पर कि संशोधन के साथ उसे अगले सत्र में पेश किया जाएगा। विधेयक वापस हो गया। सत्र समाप्त हुआ तो उसे अधिसूचित कर दिया गया। यह कितना संवैधानिक था। संविधान कहता है कि राज्य में 12 मंत्री हो। 12 महीने बीत गए 11 मंत्री ही हैं। फिर दल बदल कानून पर लिये जानेवाले फैसले को हमें पांच साल तक लटकाने का अधिकार है।

लोकसभा के पूर्व महासचिव जीसी मल्होत्रा ने कहा कि अगर विधायक या सांसद सक्रिय और सजग रहें तो जनहित या राज्यहित के किसी मुद्दे को वह सदन में दबने नहीं दे सकते। इसके लिए उनके पास प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण, शून्यकाल, कार्य स्थगन जैसे साधन के साथ साथ राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के अलावा भी विभिन्न समितियां है। इसी क्रम में चुटकी लेते हुए मल्होत्रा ने कहा कि अगर यहां भी उनकी बातें दब रही हैं, तो वह पक्ष विपक्ष के इतर स्पीकर की पार्टी में शामिल हो जायें। स्पीकर का कभी कभी उन पर ध्यान जायेगा ही। पूरक प्रश्न प्वाइंटेड और सोच समझ कर पूछें। नहीं तो कार में स्पीकर के साथ बैठ कर जाते समय बात करें।

प्रशिक्षण कार्यक्रम में विस अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष अन्य।

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