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75 मीटर दूर थी मौत, पर जिंदगी ने नहीं दी मोहलत

5 वर्ष पहले
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टाटीरेलवे स्टेशन के पास हुए हादसे में मृत पायलट डीके दास और को-पायलट सूरज कुमार बच सकते थे, लेकिन रेलवे सिस्टम पर उनके भरोसे ने ही उनकी जान ले ली। जिस मालगाड़ी के इंजन में वे सवार थे, वहां से लगभग 75 मीटर अागे वह ट्रैक दिखता है, जिस पर मौत बन कर यूटीवी रही थी। तेज स्पीड में रही यूटीवी उनको साफ दिखी होगी। लेकिन डीके दास और सूरज को रेलवे के मजबूत सिग्नल सिस्टम पर भरोसा रहा होगा। वे निश्चिंत रहे होंगे कि यूटीवी उनके ट्रैक (नंबर टू) पर नहीं आकर ट्रैक वन या थ्री पर जाएगी। अगर उनको यह भ्रम नहीं होता, तो यूटीवी को अपनी ओर आते देख वे जान बचाने के लिए खड़े इंजन पर से दाएं-बाएं जरूर कूद गए होते। और, कुछ नहीं तो कम से कम इंजन के बाएं-दाएं बने कॉरिडोर में भी चले गए होते, तो झटके से हाथ-पांव भले ही टूट जाते पर उनकी जान तो कम से कम बच ही गई होती।

टाटी स्टेशन, जहां यह हादसा हुआ, उस स्टेशन पर तीन ट्रैक बने हैं। बीच वाले ट्रैक नंबर टू पर मालगाड़ी खड़ी थी। जब सामने से रिवर्स बैक में यूटीवी रही थी, उस वक्त यदि ट्रैक चेंजर मेन लाइन से ट्रैक वन या थ्री को जोड़ दिया होता, तो यूटीवी दूसरे ट्रैक से गुजर जाती, जिसे आगे कंट्रोल कर जानमाल की क्षति बचाई जा सकती थी। परंतु, टाटी स्टेशन के सिग्नल मैन ने ट्रैक थ्री से आधा घंटा पहले यूटीवी को रवाना करने के बाद अगले स्टेशन कनरवा पहुंचने की सूचना मिले बिना ही ट्रैक चेंजर को शिफ्ट कर ट्रैक टू को मेन लाइन से जोड़ दिया।

{टाटी से कनरवा जाने में 20 मिनट से ज्यादा समय लगना था {जब तीन नंबर से यूटीवी कनरवा के लिए खुली, तो कनरवा के स्टेशन मास्टर टाटी के स्टेशन मास्टर से बात करते कि यूटीवी पहुंच गई, लेकिन ऐसा नहीं हुआ {20 मिनट से ज्यादा लेट होने पर इन्क्वायरी होनी चाहिए थी {कनरवा स्टेशन जब तक यूटीवी नहीं पहुंचती, तब तक मेन लाइन पर मालगाड़ी को नहीं लाना था {जब तक कनरवा स्टेशन पर यूटीवी पहुंच नहीं जाती, तब तक रूट भी नहीं चेंज करना चाहिए {हेवी लोड होने पर अक्सर बैक होने के चांस बढ़ जाते हैं और ब्रेक फेल हो जाता है।

{ स्टेशन मास्टर द्वारा नियमों के साथ तकनीकी उल्लंघन की गहन जांच हो।

{ट्रैक मशीन का ब्रेक पावर के सर्टिफिकेट की जांच की जाए।

{यूटीवी की ब्रेकिंग कैपेसिटी के सर्टिफिकेट की जांच हो।

{मैनुअली ट्रैक मशीन के जनरल वर्किंग को चेक किया जाए।

{रोलिंग डाउन होने पर सुरक्षा के बिंदु।

{रोलिंग डाउन होने पर गार्ड, सुपरवाइजर का क्या रोल है।

{गार्ड सुपरवाइजर का क्या रोल है।

{इंजन फेल होने के क्या कारण हैं।

{एमसी ऑपरेटर की योग्यता की जांच।

{गार्डेड सेक्शन में ट्रैक मशीन का वर्क।

घटना के बाद चार घंटे के लिए रांची डिविजन से ट्रेनों का परिचालन ठप हो गया। पायलट जिस स्टेशन पर थे, वहीं ट्रेन छोड़ कर विरोध करने लगे। ट्रेन रुकी होने की वजह से यात्रियों को पहले तो समझ ही नहीं आया कि अचानक क्या हो गया। कुछ यात्रियों ने रेल मंत्री को ट्विट कर बताया कि ट्रेन से पायलट गायब हैं। पायलटों के अचानक आंदोलन पर चले जाने से टाटा-हटिया झाड़सुगुड़ा पैसेंजर, शताब्दी एक्सप्रेस, जनशताब्दी एक्सप्रेस, रांची- देवघर इंटरसिटी, तपस्विनी एक्सप्रेस, राउरकेला-जम्मूतवी एक्सप्रेस, धनबाद-रांची इंटरसिटी एक्सप्रेस, आसनसोल पैसेंजर, धनबाद-एल्लेपी एक्सप्रेस, गरबेता पैसेंजर, वनांचल एक्सप्रेस, रांची-दिल्ली गरीब रथ एक्सप्रेस सहित दर्जनों ट्रेनें जहां-तहां फंसी रहीं।

रांची स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर ट्रेन खुलने के इंतजार में खड़े यात्री।

ट्रैक टू पर मालगाड़ी के पायलट, को-पायलट जहां रवानगी के लिए तैयार खड़े थे, वहां लाइन मुड़ने के कारण महज 70-75 मीटर अागे तक का ही ट्रैक दिखाई देता है। उन पर कहर बन कर टूटी यूटीवी को जब 75 मीटर दूर उन्होंने देखा होगा, तो जान बचाने के लिए उनके पास लगभग एक मिनट का समय रहा होगा। ऐसे में वे इंजन से कूद कर जान बचा भी सकते थे। यूटीवी जब मालगाड़ी से महज 25 मीटर दूर रही होगी, तो ट्रैक चेंजर के माध्यम से उसे दूसरे ट्रैक पर जाना था। लेकिन जब वह सीधे उसी ट्रैक पर आती दिखी होगी, तो डीके दास और सूरज के पास मौत से बचने के लिए महज 20 सेकेंड का समय बचा होगा। अगर उनको दुर्घटना का जरा भी अंदेशा होता, तो वे खुद को बचाने का प्रयास करते, पर जिस हालत में वे फंसे मिले, उससे साफ जाहिर होता है कि वे सिस्टम के भरोसे में मारे गए।

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