रांची. राजधानी से 200 किमी दूर चाकुलिया मेंलकड़ी माफिया भोले-भाले ग्रामीणों को बहला-फुसलाकर चोरी-छिपेएक-एक कर लगातार पेड़ काटे जा रहे थे। गांव की नई-नवेली बहू यमुना टुडू से यह देखा नहीं गया और वह जंगल को बचाने हाथ में तीर-धनुष लेकर घर से बाहर निकल पड़ी। उन्होंने गांव में वन सुरक्षा समिति बनाई और जंगल व हरियाली बचाने में जुट गईं।
धनुष-तीर से ही किया माफिया का विरोध...
इस काम में पति मानसिंह टुडू का भी पूरा साथ मिला। इलाके की हजारों महिलाओं को जंगल बचाओ अभियान से जोड़ा। महिलाएं पारंपरिक हथियार तीर-धनुष, फरसा, गंडासे के साथ लकड़ी माफिया के खिलाफ उठ खड़ी हुईं और शुरू हो गया यमुना का जंगल बचाने का अभियान।
लकड़ी माफिया को पकड़कर सजा देने और खदेड़ने का दौर शुरू हुआ। पहले उठक-बैठक कराई, फिर पिटाई। इससे माफिया डरने लगे हैं। अब नतीजा यह है कि तीन हजार हेक्टेयर में जंगल लहलहा रहे हैं। जंगल की हिफाजत के लिए यमुना ने गांव-गांव जाकर महिलाओं को जागरूक किया।
गांव की औरतों और पेड़ों में भाई-बहन का रिश्ता
अब तक वे चाकुलिया प्रखंड के 80 गांवों में वन सुरक्षा समिति गठित कर हजारों महिलाओं को अभियान से जोड़ चुकी हैं। महिलाएं पेड़ को भाई मानती हैं। हर साल रक्षा सूत्र बांधती हैं। घर का कामकाज निपटाने के बाद ये तीर-धनुष, टांगी और कुदाल लेकर पहरा देने जंगल पहुंच जाती हैं। यमुना ने इन महिलाओं को पौधरोपण के लिए भी प्रेरित किया।
ग्रामीणों को शिक्षित करने के लिए यमुना ने जमीन दान कर स्कूल खुलवाया। शुद्ध पेयजल के लिए स्वजलधारा योजना के तहत पंप हाउस की व्यवस्था कराई। यमुना को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी सम्मानित कर चुके हैं।
ताकि लोगों को शुद्ध हवा मिले
ओड़िशा के रायरंगपुर के छोटे से गांव में जन्मीं यमुना की शादी 1998 में चाकुलिया के मानसिंह टुडू से हुई। शादी के बाद ससुराल पहुंचते ही उन्होंने अभियान शुरू कर दिया।
यमुना ने कहा, उनका गांव वीरान था। पिता गांव में हरियाली लाना चाहते थे। वे अपनी खेत की मेढ़ों पर पौधे लगाया करते थे। फिर उसकी देखरेख भी करते थे। वह भी पिता का हाथ बंटाती थीं। पिता से ही उन्हें जंगल बचाने की प्रेरणा मिली।
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