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जबां थक गई दास्तां कहते-कहते...

6 वर्ष पहले
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‘गायब होता देश’ 10 सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में शामिल

रणेंद्र ने विज्ञान में स्नातक किया है और राज्य प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हैं। 1999 से 2005 के बीच ‘कांची’ त्रैमासिक पत्रिका का संपादन किया। उनकी कहानी ‘रात बाकी’ को कथादेश की अिखल भारतीय प्रतियोगिता 2005 में प्रथम स्थान मिला। पहला उपन्यास ‘ग्लोबल गांव के देवता’ चर्चित रहा है। कहानियों का संग्रह ‘रात बाकी और अन्य कहानियां’ तथा कविताओं का संग्रह ‘थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूं’ है। ‘गायब होता देश’ उनका दूसरा उपन्यास है।

हिंदी प्रकाशनजगत में सुुप्रतिष्ठित भारतीय ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ ने जुलाई 2013 से नवंबर 2014 तक लेखक-पाठक सर्वेक्षण की शुरुआत की थी। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य था कि पाठकों लेखकों के माध्यम से हिंदी की साल 2013 एवं 2014 की श्रेष्ठतम पुस्तकों का चयन किया जाए। यह सिलसिला दिसंबर 2014 तक चला। पाठकों और लेखकों से पत्र, ईमेल, फेसबुक, एसएमएस आदि के जरिए उनकी पसंदीदा स्तरीय पुस्तकों के बारे में जानकारियां मांगी गईं। प्राप्त प्रविष्टियों में से चयन हेतु एक प्राथमिक चयन समिति का गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता डाॅ. रणजीत साहा, संपादक, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ को सौंपी गई। प्राथमिक चयन समिति द्वारा चयनित पुस्तकों की सूची पुनः एक समिति के समक्ष रखी गई जिसके अध्यक्ष जाने-माने आलोचक डाॅ. विश्वनाथ त्रिपाठी थे और संयोजक सुप्रसिद्ध कवि लीलाधर मंडलोई, निदेशक, भारतीय ज्ञानपीठ थे।

संस्करणकी बिक्री का मानक गढ़ा : वर्ष2013 एवं 2014 के उपन्यासों की सुविस्तृत सूची से दो-दो चयन समितियों से अनुमोदित होकर जो दस सर्वश्रेष्ठ उपन्यास चयनित हुए उनमें रांची, झारखंड के सुख्यात कवि-कथाकार रणेन्द्र का उपन्यास ‘गायब होता देश’ भी सम्मिलित है। जून 2014 में ‘पेंगुइन इंडिया’ से प्रकाशित इस उपन्यास ने पंद्रह दिनों में एक संस्करण की बिक्री कर एक मानक गढ़ा था। इस उपन्यास को दुनिया में सबसे तेजी से बिकने वाली 500 पुस्तकों में शामिल किया था।

पुस्तक : रेड जोन

लेखक : विनोद कुमार

प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली

कीमत : 395

पृष्ठ : 400

पुस्तक-समीक्षा

हम अपनी पीढ़ी में अंतिम इतिहास नहीं लिख सकते, लेकिन हम परंपरागत इतिहास को रद्द कर सकते हैं और इन दोनों के बीच प्रगति के उस बिंदु को दिखा सकते हैं, जहां हम पहुंचे हैं। सभी सूचनाएं हमारी मुट्ठी में हैं और हर समस्या समाधान के लिए पक चुकी है-ऐक्टन

गुंजेश

एलोपैथमें अक्सर होता है कि कान की बीमारी के इलाज के लिए नाक में दवाई दी जाती है। साहित्य रचना बीमारी का इलाज भले ही हो, लेकिन उसको डायग्नोस करने का एक तरीका तो जरूर है। विनोद कुमार रचित ‘रेड जोन’ ऐसा ही एक उपन्यास है जो हमारे आसपास मौजूद समाजों (दल, वर्ग, जाति, राष्ट्र, या जो भी नाम हम देना चाहें) में समाधान के लिए पक चुकी समस्याओं को समग्रता में डायग्नोस करता है। रेड जोन में सिर्फ रेड जोन की बात नहीं है बल्कि यह पूरे झारखंड और उसके बनने के क्रम में यहां की सामाजिक हलचलों का दस्तावेज है। खुद लेखक इस बारे में लिखते हैं \\\"सच पूरा का पूरा देखना तो कठिन है ही, लिखना और भी ज्यादा कठिन। कुछ यथार्थ और कल्पनाओं को जोड़ कर यह रचना बनी है। मौजूदा राजनीति, राजनेताओं, पत्रकारों के ब्योरे में यथार्थ का अंश ज्यादा है। झारखंड को लाल रंग देती भूमिगत गतिविधियों और प्रवृत्तियों में कल्पना का अंश ज्यादा।\\\' (दो शब्द)

रेड जोन में दर्ज समय झारखंड अलग राज्य बनाने की मांग से लेकर अलग राज्य बनने के कुछ बाद तक का है। पहली नजर में उपन्यास का नायक मानव दिखता है जो कि लौहनगरी में राजधानी से निकलने वाले एक अखबार का स्टाफ रिपोर्टर है। लेकिन पाठ खत्म होते ही यह सवाल उठता है कि क्या वाकई मानव उपन्यास का नायक है? या वह उस दिक (स्पेस) में जिसमें उपन्यास रचा गया है, के काल (टाइम) का प्रतीक है। जिसमें सब कुछ घटित हो रहा है। लेकिन उन तमाम घटनाओं पर उसका कोई प्रभाव नहीं है। वह सिर्फ मौजूद है और कई बार तो पीड़ित भी। उपन्यास अपने आधे हिस्से में जिस सवाल को प्रमुखता से उठाता है वह है \\\"... अब देखिए न, इस लौह कारखाना के चलते इस औद्योगिक शहर के रूप में झारखंड में समृद्धि का एक द्वीप जरूर बन गया है, लेकिन यहां के आदिवासियों और मूलवासियों को क्या मिला?\\\'

सुप्रसिद्ध आलोचक वीर भारत तलवार ने अपने किसी लेख में शिबू सोरेन का जिक्र करते हुए लिखा था कि कभी सोचा था कि उन पर किताब लिखूंगा लेकिन अब स्थितियां काफी बदल गईं हैं। रेड जोन में गुरुजी की कहानी शिबू सोरेन की उन्हीं बदली हुई स्थितियों का बयान है। गुरुजी, बाटूल, मुक्ति मोर्चा, मंडल जी, विस्थापन की राजनीति। भाजपा, दादा, बिहार, वनांचल की मांग। दुर्गा, कालीचरण, तेज सिंह, लेवाटांड़, पछियाहा राजनीति, दारोगा, बंदूक और उसकी नली से निकलने वाली सत्ता का स्वप्न। दो अन्य नेता एके राय और महेंद्र सिंह। इन सब से गुजरने वाला मानव, मानव पर नजर रखने वाला उसका अखबार और अखबार के संपादक हर्षवर्द्धनजी।

क्या हम यह मान सकते हैं कि ऐतिहासिक समस्याएं हमेशा व्यक्तिगत व्यवहार और व्यक्तिगत सनक की समस्या होती है। चाहे वह अलग राज्य को लेकर चला आंदोलन हो या फिर राज्य बनने के बाद सत्ता हासिल करने की राजनीति, इत्तिफाक से झारखंड में हमेशा व्यक्तियों के इर्दगिर्द ही नाचती रही है। \\\"इसके अलावा झारखंडी समाज में एक और द्वंद्व है, वह है बाहरी और भीतरी का। कॉमरेड राय ने इस विभाजन- रेखा को एक दशक पहले बहुत गहरा कर दिया था।\\\' (पृष्ठ सं. : 121) में लेखक व्यक्ति आधारित राजनीति के साथ-साथ नेताओं के व्यक्तिवादी होने पर भी टिप्पणी कर रहा है। मानव खुद जेपी आंदोलन से निकल कर पत्रकारिता के क्षेत्र में अाया है और जन आंदोलनों की ओर सहानुभूति रखता है। लेकिन यह मानव का जेपी आंदोलन के मोह से निकला हुआ मन है या पत्रकारिता में रम चुका वस्तुनिष्ठ दिमाग कि वह किसी भी व्यक्ति पर चाहे वह गुरुजी हों, एके राय हों, दादा हों या महेंद्र सिंह हों पूरी तरह भरोसा नहीं करता। वास्तव में यही उपन्यास के पूरे क्राफ्ट की विशेषता और सफलता है कि वह किसी को हीरो नहीं बनाता। वरना हाल के दिनों में आदिवासियों और जन आंदोलनों के हीरो गढ़ने की जो परंपरा चल निकली है वह इतिहास दृष्टि में बहुत अधिक गलतियां और भ्रम पैदा कर रही हैं।



कालीचरणऔर दुर्गा

दोआदिवासी चरित्र उभर कर सामने आए हैं। कालीचरण बरास्ते गुरुजी वामपंथ और फिर माओवाद की शरण में चला जाता है। दुर्गा पर समय की नजर कुछ ऐसी पड़ी है कि उसे यकीन होने लगा है कि सत्ता बंदूक के रास्ते से ही मिल सकती है। कालीचरण तो पहले से ही हिंसा के मार्ग के पक्ष में नहीं था। लंबी बहसों और हत्याओं के एक सिलसिले के बाद दुर्गा को भी लगने लगता है कि \\\"लड़ें-मरें हम और निर्णय कोई और ले। हमारे यहां ऐसा नहीं होता।

यह कहने में कोई संकाेच नहीं है कि लेखक ने वो सारे खतरे उठाए जो इस उपन्यास को व्यक्तिवादी और सेंसेशनल बना सकता था और लेखक उन सब खतरों के बीच से समाज में फैले कमिटमेंट की कमी को दर्ज करने में भी कामयाब हुआ। चाहे वह पत्रकारिता से जुड़े मानव के अपने सवाल हों या फिर राजनीतिक हलकों से जिंदा नजिरों को उठाना। वीर भारत तलवार ने फ्लैप पर सटीक ही लिखा है कि लेखक के जवाबों से कोई सहमत या असहमत हो सकता है लेकिन उसकी ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता। अंत में सिर्फ इतना ही कि यह केवल एक राजनीतिक उपन्यास है बल्कि पिछले कुछ समय का एक महत्वपूर्ण डाक्यूमेंट भी है।

बनते-बिगड़ते झारखंड का दस्तावेज

सृष्टि में

जब बना मानव

तब नहीं बना था

गीत

संगीत

और वाद्ययंत्र

धतिंग तांग धतिंग...

पुरखों ने रचे/ गीत संगीत

और बनाए/ वाद्ययंत्र

मांदर-नगाड़ा/ और बांसुरी

और इसे सौंप दी/ अपने नाती

मंगरा को/ परिवार में सुख-दुःख

मनाने के लिए/ धतिंग तांग धतिंग...

जब मंगरा जाता/ जंगल

ले जाता अपने साथ/ बांसुरी

गयारों के कानों में/ सुनाई पड़ती पहले

घंटी की टुन-टुन/ फिर तरह-तरह के

खुशबुओं संग/ सुरीली बांसुरी की तान

सुन धुन बांसुरी/ ढोर-डांगर मारे मलक

धतिंग तांग धतिंग...

जब मंगरा जाता / अखड़ा

तो एक कंपन/ पैदा हो जाती

ढोल-मांदर/ और नगाड़े की

पूरे गांव में/ धतिंग तांग धतिंग...

मांदर की गूंज/ नचा भी देता

और रुलाता भी है कभी/ गर कभी पहाड़ों में/ मर जाता कोई

ढोल की विशिष्ट ताल से/ मिल जाती है खबर/ आस-पास

धतिंग तांग धतिंग...

बदला जमाना/ मांदर गूंगा

सांप सुंघा/ करम ठमका

ठमका जितिया/ झुमर और जदूर

अब गीत गाए नहीं/ लगे सुने जाने

मांदर/ और बांसुरी की जगह

अब लगे हैं बजने/ भोंपू

बाजार ने कर दिए हैं/ इन वाद्यों के कड़ी ढील/ जिससे हो गई है

रसिकों की नाड़ी ढील...

अब नहीं सुनाई पड़ती/ अखड़ा में

धतिंग तांग धतिंग...

रस्मों-रिवाजों में

डीजे कर चालू

मानने लगे हैं लोग

समथिंग इज बेटर देन नथिंग!

(संपर्क: शास्त्री नगर, कांके रोड, रांची)

मांदर का दरद

‘जिनके ख्वाबों में खनकते थे सुहाने सिक्के/वो मेरे शहर में आए हैं जमाने सिक्के।।’

कालजयीरचनाओं के रचयिता धनबाद के प्रसिद्ध उर्दू शायर वकार कादरी का पिछले दिनों 14 दिसंबर को निधन हो गया। उनका वास्तविक नाम आशिक हुसैन था। वकार कादरी के छद्म नाम से वे शायरी करते थे और इसी नाम से प्रसिद्ध भी हो गए।

शिक्षा-दीक्षा: इनकीशिक्षा झरिया शहर में हुई। रांची विश्वविद्यालय से उर्दू में प्रथम श्रेणी से एमए की डिग्री प्राप्त की। कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेखन का कार्य किया। बाद में आजीविका के लिए अध्यापन के कार्य से जुड़ गए।

रचना-प्रक्रिया: वकारकादरी की साहित्यिक यात्रा 1963 ई. में वकार असकरी के नाम से आरंभ हुई। कादरी सिलसिले से मुरीद होने के बाद ‘वकार कादरी’ के नाम से लिखने लगे। पहली गजल का प्रकाशन मासिक पत्रिका ‘सुहैल’ में 1963 ई. में हुआ। वे पद्य रचना के साथ गद्य विद्या में भी निपुण थे।

काव्य-कृतियां: इनकीरचनाओं में मसनवी ‘सैयदुल हिंद’, ‘तोहफा अकीदत’, ‘तजल्लियाते तैबा’, ‘मनाकिबे अमीरुल हिंद’, ‘मनाकिबे गौसो ख्वाजा’ इत्यादि उल्लेखनीय हैं। शान भारती और डॉ. हबीब आदिल पर शोध कार्य भी किया। झारखंड के उर्दू कवियों पर लिखित पुस्तक ‘सुखनवाराने-झारखंड’ के लेखन की निगरानी की और इसका मुकदमा भी लिखा। इनकी नवीन कृति ‘तीसरी आंख’ प्रकाशित हो चुकी है, जिसका लोकार्पण 21 फरवरी, 2015 को होनेवाला है।

शायरीमें आशावादिता झलकती है : इनकीशायरी में नवीनता का समावेश है, वहीं आशावादिता झलकती है।

‘गिरकर भी इंसान संभल सकता है/उम्मीद का चश्मा भी उबल सकता है/तारीख के औराक, उलट कर देखो/इंसान जमाने को बदल सकता है।’

इनकीशायरी में जहां प्रेम-सौंदर्य का पुट है, वहीं सूफी काव्य की धारा भी प्रवाहमान है। उन्हीं की पंक्तियों में-

‘मेरी चश्मे नम अब कहेगी फसाना

जबां थक गई दास्तां कहते-कहते। (संपर्क: मदनाडीह, बांसजोड़ा, धनबाद)

गुलाम गौस ‘आसवी’

स्मृतिशेष

शायर वकार कादरी

हमारा पता : साहित्य, दैनिक भास्कर, 601-602, पंचवटी टावर, हरमू रोड, रांची

ईमेल आईडी kundan.kumar@dainikbhaskargroup.com

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सुनील मिंज