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करोड़ों खर्च के बाद भी मलेरिया का डर कायम

7 वर्ष पहले
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राजधानीमें मच्छरों का प्रकोप तो हमेशा ही रहता है, लेकिन बरसात से मच्छरों की संख्या अचानक बढ़ गई है। शहर के लगभग सभी हॉस्पिटलों में सर्दी-बुखार की शिकायत लेकर पहुंच रहे मरीजों की मलेरिया और डेंगू की जांच भी कराई जा रही है। यानि डेंगू और मलेरिया से बचने के लिए लोग डॉक्टर और दवा पर पैसे खर्च कर रहे हैं। इस प्रकार मच्छर के प्रकोप से बचने के लिए हर माह करोड़ों रुपए खर्च कर दिए जा रहे हैं। लेकिन निगम की व्यवस्था से मच्छर मरते नहीं, कुछ देर के लिए भाग जाते हैं। पिछले माह मलेरिया विभाग ने शहर का गंदा पानी कलेक्ट कराया था। अधिकतर घरों में मच्छर का लार्वा पाया गया है। इस रिपोर्ट के बाद निगम की मच्छर से निपटने की व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं।

लोगों की जेब पर असर

15 करोड़ का कारोबार

शहर में मिडिल क्लास के एक लाख मकानों में एक दिन में औसतन दो एंटी मॉस्किटो क्वाइल जलता है। दो क्वाइल की कीमत पांच रुपए है। यानि एक माह में एक घर में 150 रुपए सिर्फ क्वाइल पर खर्च होता है। वहीं, हाई क्लास के 25 हजार मकानों में अधिकतर मॉस्किटो रीफिल यूज होता है। एक घर में एक माह में चार रीफिल यूज होने पर लगभग 200 रुपए खर्च होते हैं।

1,00,000गुणा 150 रुपया/माह = ~1,50,00,000(मध्यम आय वर्ग)

25,000गुणा 200 रुपया / माह = 50,00,000(उच्च आय वर्ग)

ग्रॉसरी दुकानदार राजेश साहू ने बताया कि रांची में गर्मी से बरसात तक एंटी मॉस्किटो प्रोडक्ट का 15 करोड़ से अधिक का कारोबार है। प्रतिमाह लगभग तीन करोड़ रुपए का कारोबार होता है।

ऐसे खर्च हो रही गाढ़ी कमाई

शहर में गंदगी की भरमार और खुली नालियों की वजह से मादा एनोफिल, एडीस मच्छर का लार्वा तेजी से पनपता है। इससे मलेरिया और डेंगू जैसी घातक बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए लोग स्मोक क्वाइल, एक्टिव रीफिल, कॉम्बी मशीन और स्प्रे का उपयोग करते हैं। इन उत्पादों की खरीदारी पर एक घर में प्रत्येक माह औसतन 100 से 200 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। इस तरह शहर के लोग प्रत्येक माह लगभग दो करोड़ रुपए एंटी मॉस्किटो प्रोडक्ट पर खर्च कर देते हैं। वहीं, दूसरी ओर नगर निगम प्रत्येक माह मच्छर से निपटने पर लगभग 25 लाख रुपए खर्च कर रहा है। इसके बाद भी मच्छर जनित बीमारियों से निपटना मुश्किल हो गया है।