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किसी का गला रुंधा, तो कोई ठहाके लगाता रहा
दोस्तो, मैं डॉक्टर सज्जन सिंह... पागल डॉक्टर हूं। मतलब सायकियाट्रिक का चिकित्सक होने के कारण लोग मुझे पागल डॉक्टर ही कहते हैं। जबकि डॉ. सुधीर मंडल ने कहा मैं बिहारी था... ओब बोंगाली हो गया हूं। वेस्ट बंगाल में रह रहा हूं। ये अपना कॉलेज भी बिहारी की जगह झारखंडी हो गया। ऐसे ढेरों जुमले शनिवार को रिम्स ऑडिटोरियम में सुनने को मिले। मौका था रिम्स के पहले यानी 1964 बैच के छात्रों के गोल्डन जुबिली सेलिब्रेशन का। इसमें डॉक्टरों ने अपना परिचय इसी अंदाज में दिया।
समारोह में देशभर के 60 डॉक्टर्स अपने परिवार के साथ जुटे थे। हर कोई एक-दूसरे से मिलकर बीते दिनों को जीवंत बनाने को उतावला रहा। बोलते-बोलते कइयों का गला रुंध आया, तो पुरानी चुहलों को याद कर ठहाके भी लगे। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. विक्टर जेडक और डॉ. आरएन सिंह ने किया था। सभी छात्रों को शॉल पर मोमेंटो प्रदान किया गया। कार्यक्रम में डॉ. जयश्री भट्टाचार्य, डॉ. सुरेश प्रसाद, डॉ. अवधेश कुमार सिंह, डॉ. देव कुमार मुखर्जी, डॉ. एके वर्मा और डॉ. निर्मला सिंह उपस्थित रहीं।
भावों को किया व्यक्त
गुब्बारे उड़ा कर दिया संदेश
छात्रों ने रिम्स कैंपस स्थित राजेंद्र पार्क में जाकर शांति के प्रतीक गुब्बारे हवा में छोड़े और रिम्स की तरक्की के लिए प्रार्थना की। वहीं सभी छात्रों ने एक ग्रुप फोटो भी खिंचवाए। इसमें सभी की फैमिली भी शामिल हुई। एक-एक एलबम सभी छात्रों को दिए जाएंगे। इसके अलावा बैच की पुरानी तस्वीरों की एक-एक कॉपी भी दी गई।
कैंपस देख सेल्फी ली
करीब 50 साल बाद बाद रिम्स पहुंचे सभी पुराने छात्र एक साथ भ्रमण को निकले। इन छात्रों ने हर दरो-दीवार को निहारा। किसी ने पार्क के फूलों में वही पुरानी खुशबू महसूस करने की कोशिश की, तो किसी ने अपने कमरे की खिड़कियों के दरवाजे को टटोला। कोई उछल-उछल कर चबूतरे पर चढ़ रहा था, तो किसी को सेल्फी लेने की हड़बड़ी रही। नौ पौधे भी पार्क में लगाए गए।
^गोल्डन जुबिली ने मानो हमारे कॉलेज के दिन लौटा दिए। जब से आयोजन के बारे में सुना, पुराने दिन में खो गई। वहीं कैंपस, दोस्त, टीचर्स बहुत याद रहे हैं।\\\'\\\' -डॉ.शशि अय्यर
^मैं तो पुनर्मिलन में पहले भी चुका हूं, पर अपने अधिकतर बैचमेट से कॉलेज छोड़ने के बाद आज ही मिल पा रहा हूं। आज रात हम सब मिलकर गाएंगे।\\\'\\\' -डॉ.सुरेश्वरी पांडेय
^जैसे ही सुना गोल्डन जु