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इंसानियत के कंधों पर आज मिलेगी सात को मुक्ति

7 वर्ष पहले
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वेकहां के थे। किन-किन गांव-शहरों में उनका बचपन मुस्कुराया, जवानी की उमंग ने कहां अंगड़ाई ली, तो मौत उन्हें कहां से कहां ले आई। ये कोई नहीं जानता। कहीं उनके भाई इन्हें ढूंढ रहे होंगे, तो कहीं उनके मां-पिता की आंखें इंतजार में पत्थर हो चुकी होंगी। कोई मासूम पापा-पापा की रट लगाए रोज मां की गोद में सो जाता होगा। बात रिम्स के मुर्दाघर में करीब तीन महीनों से पड़ी लगभग 45 लाशों की हो रही है। इनके भी तो अपने होंगे कहीं सुबकते हुए। वे मस्जिद जाते थे या मंदिर, चर्च या गुरुद्वारा। इसका भी पता किसी को नहीं। लेकिन शुक्रवार को इनमें से सात की अर्थियों को हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई सभी का स्नेहिल कंधा नसीब होगा। ढेरों भावुक मन बिलखेंगे, तो कई आंखें नम होंगी। वहीं मुक्ति नामक नई संस्था की देखरेख में इनकी अंत्येष्टि हरमू मुक्तिधाम के पास स्वर्गद्वार में दिन के 12 बजे की जाएगी।

आपकी श्रद्धा का भी बनता है एक फूल

भास्कर सरोकार

मुक्ति की इस पहल का सभी ने अभिनंदन किया है। इन अनाम आत्माओं के माेक्ष के लिए ढेरों लोग आगे आए हैं। क्यों नहीं हम उनके अपने बनकर सम्मान के साथ उनका दाह संस्कार करें। भास्कर अपने सामाजिक सरोकारों के तहत अपने पाठकों से अपेक्षा करता है कि वे भी श्रद्धा का एक फूल इनकी अर्थियों को समर्पित करें। आपका एक पल उनकी आत्माओं की शांति के लिए सहायक होगा। संस्था मुक्ति के इस नेक काम में आपकी मिली मदद आपको मुक्तिदाता का ही खिताब देगी।

कल स्वर्णरेखा नदी में प्रवाहित की जाएंगी अस्थियां

गौरतलब है कि राजधानी में लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के लिए प्रशासन को हमेशा हजारीबाग की मुर्दा कल्याण समिति को बुलाना पड़ता था। लेकिन पिछले दिनों शहर के प्रबुद्ध लोगों ने मिलकर संस्था मुक्ति का गठन किया। शवों के संस्कार के लिए वाहन और लकड़ी की व्यवस्था निगम करेगा। शनिवार को इनकी अस्थियां स्वर्णरेखा नदी में प्रवाहित की जाएंगी। जबकि रविवार को गोशाला में पिंडदान, तो काली मंदिर में दरिद्र भोज का आयोजन भी मुक्ति करेगी।