पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • झारखंडी संस्कृति में जड़ों की पहचान है वाद्य यंत्र : वंदना

झारखंडी संस्कृति में जड़ों की पहचान है वाद्य यंत्र : वंदना

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
झारखंडकी संस्कृति में गीत-नृत्य रचा बसा है। नई पीढ़ी को हमारे सांस्कृतिक विरासत वाले सारे वाद्य यंत्र सहज उपलब्ध हो सकें। इसके पुराने कलाकार को उनकी कला ही जीविका उपलब्ध करा दे इस दिशा में यह कार्यशाला मील का पत्थर साबित होगा। ये वाद्य यंत्र हमारी जड़ों की पहचान हैं। इन्हें जानना हमारा फर्ज भी है और संस्कृति में रचने बसने का रास्ता भी। ये बातें कला संस्कृति विभाग की सचिव वंदना डाडेल ने शुक्रवार को रामदयाल मुंडा कला भवन में कही। वे विभाग द्वारा आयोजित 15 दिवसीय पारंपरिक वाद्य यंत्र प्रशिक्षण कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि बोल रही थीं। कार्यशाला का उदघाटन वाद्य यंत्र बजाकर किया गया। इस अवसर पर विभाग के निदेशक अनिल कुमार सिंह ने कहा कि कार्यशाला के माध्यम से हम संस्कृति को संरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। कार्यशाला का संयोजन शरण उरांव बंदी उरांव कर रहे हैं। कार्यक्रम में उपनिदेशक विजय पासवान, डॉ. गिरधर राम गौंझू, डॉ. सरफुद्दीन, कमल बोस, शरण उरांव उपस्थित थे।

इन यंत्रों का प्रशिक्षण

कार्यशालामें विभिन्न प्रकार के मांदर नगाड़े के अलावे झिमरी, मंजिरा, घंटा, करताल, सोयको, ठेचका, खोचोर, रटरटिया, मुरली, बांसुरी, भेर, नरसिंहा, शहनाई, केंद्रा, ढाक, ढोल, रपका, झाझ, टुहिला, घुंघरू, पेंजनी, सारंगी का निर्माण बजाने का तरीका बताया जाएगा। प्रशिक्षण के लिए राज्य के विभिन्न गांवों से पंचू, चरण, बुधनाथ ,तेजा, जवरा, शंकर, बंधु, जयनाथ आदि शामिल है।

कार्यक्रम में पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत करते कलाकार।