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हमने सारी ही बातें पश्चिम से सीखी हैं, चाहे वह

7 वर्ष पहले
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हमने सारी ही बातें पश्चिम से सीखी हैं, चाहे वह संविधान की बात हो या विकास का मॉडल। यही कारण है कि कृषि प्रधान देश में उद्योगों को विकास का सबसे बड़ा वाहक मानकर हम इसके प्रति लगभग अंधे हो गए हैं। खेती-बाड़ी को आवश्यकता तक सीमित कर विलासिता के लिए उद्योगों की होड़ में जुट गए। उद्योगों का अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है, पर उद्योग ही सब कुछ है, ऐसा नहीं माना जा सकता। उद्योग और सड़क के नाम पर राज्य में लाखों पेड़ बेरहमी से काट डाले गए। इसका उदाहरण रांची-टाटा रोड पर साफ-साफ देखा जा सकता है। यहां विकास के नाम पर जंगलों को उजाड़ा जा रहा है। पुराने और मोटे पेड़ों को काटा जा रहा है। आज भी देश का बड़ा हिस्सा गांवों के रूप में है। लेकिन गांवों का योगदान विकास में गौण समझा जाता है, क्योंकि ये मात्र अन्न-पानी ही दे सकते हैं, जबकि उद्योगों से वह सब मिलता है, जो आज की पीढ़ी की प्राथमिकता में है। विकास की इसी कड़ी में सरकारें अब गांवों में भी भारी उद्योग लगाकर आर्थिक क्रांति का संदेश देना चाहती हैं। बड़े उद्योगों के दावे ग्रामीण विकास और स्थानीय रोजगारों के सृजन के लिए किए जाते हैं। जबकि सच कुछ और ही होता है। जब सरकार सब कुछ जनहित में करने का दावा करती है, तो ऐसी किसी भी विवादित योजना पर सहमति से पहले सहभागिता क्यों जुटाई जाए? बड़ी योजनाओं में आम सहमति के ज्यादा फायदे सरकार को ही होंगे। सरकार को जल और जंगल का ध्यान तो विकास से पहले रखना चाहिए। इस तरह सरकारें सिर्फ लोगों के बीच भरोसा बना पाएंगी, बल्कि इससे विकास भी एकांगी नहीं रहेगा। {खबरची

विकास की आड़ में काट डाले जंगल

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