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31 लावारिस लाशों को पितृ पक्ष में िमला मोक्ष
मुर्दा कल्याण समिति के खालिद ने दिया इन्हें मानवीय सरोकारों का स्पर्श
स्थानजुमार नदी का तट। दिन शनिवार। अवसर रिम्स के मुर्दा घर में महीनों से पड़ी 31 लावारिस लाशों के दाह संस्कार का। ये कौन थे। कहां के थे। इनका रोनेवाला कहीं होगा, तो उसके आंसू बहुत पहले ही सूख चुके होंगे। लेकिन एक शख्स के नेत्र शनिवार को महज सजल थे। बल्कि पितृ पक्ष के इन दिनों में मो. खालिद ने जब हिंदू रीति-रिवाजों से इनको मुखाग्नि दी, तो मानो इन आत्माओं ने स्वर्ग का वास किया।
40शवों के लिए नहीं मिली लकड़ी
रिम्ससे समिति के सदस्यों ने शवों को वाहन पर लादकर जुमार नदी लेकर आए। तट पर चार चिताएं सजाई गईं। इन सभी पर 31 शवों को सम्मनित जगह मिली। इसके बाद इन अनाम चिताओं को मानवीय सरोकारों का स्पर्श मिला। मालूम को हो कि दैनिक भास्कर ने इस संबंध में प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी। समिति के अध्यक्ष मो. खालिद ने कहा कि अंतिम संस्कार के लिए प्रशासन से मिली लकड़ी कम पड़ गई। इसलिए मुर्दाघर में अभी और 40 शव बचे रह गए। जबकि हम तैयारी के साथ पहुंचे थे। डॉ. हाजरा ने टीम के लोगों के खाने-पीने की व्यवस्था की। इन्हें क्लिनिक की माला पांडेय रूपा कुमारी ने भी सहयोग किया।
धूप की तरह चमकता इंसानी जज्बा
हर 20 तारीख को होगा शवों का संस्कार
रिम्सके निदेशक डॉ एसके चौधरी ने कहा है कि अब रिम्स में लावारिस शवों की ढेर नहीं लगेगी। प्रत्येक माह की 20 तारीख को इनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। इसके लिए रांची नगर निगम की ओर से लकड़ी मुहैया कराई जाएगी।
हजारीबाग की मुर्दा कल्याण समिति रिम्स प्रबंधन से सूचना मिलते ही, सुबह से सक्रिय हो गई थी। मो. खालिद की अगुवाई में समिति के सदस्य मुर्दाघर पहुंचे। इनमें कोई हिंदू था, मुसलमान। इनके चेहरे पर इंसानियत का जज्बा दोपहर की धूप की तरह चमक रहा था। हालांकि सभी शव पूरी तरह सड़-गल चुके थे। एक का हाथ पकड़ा जाता, तो दूसरी ओर शव का पैर अलग हो जाता। वहीं चारों तरफ बदबू ऐसी कि अस्पताल का कोई कर्मचारी भी सामने आया। सिवाय एक्युपंक्चर थेरेपिस्ट डॉ. आरके हाजरा के। उन्होंने शव निकालने से लेकर स्टिकर चिपकाने तक में समिति के सदस्यों की मदद की।
12 सितंबर को दैिनक भास्कर ने छापी थी खबर।