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सांसारिक जीवन का त्याग कर युवतियां बन गईं जैन साध्वी

7 वर्ष पहले
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शिखरजी,पारसनाथ स्थित तलेटी तीर्थ सोमवार को जैन धर्म के लिए पवित्र दिन रहा। इस पवित्र भूमि पर पहली बार एक साथ 11 मुमुक्षुओं ने सांसारिक जीवन का त्याग कर पंच महाव्रत (वैराग्य) को धारण किया। झारखंड की धरती पर ऐसा पहली बार हुआ कि इतने लोगों ने दीक्षा ग्रहण किया है। इनमें आठ युवतियां भी थीं, जो सांसारिक वैभव को त्याग सफेद वस्त्रों को धारण कर जैन साध्वी बन गईं।

दीक्षा के सभी विधान श्वेतांबर जैनियों के परमाचार्य कीर्तियश सूरीश्वर महाराज के सानिध्य में संपन्न हुआ। गवाह बने सैकड़ों स्त्री-पुरुष श्रद्धालु। जिनकी आंखें तो भरी थीं, लेकिन, चेहरे खिले हुए। वहीं, मुमुक्षुओं की खुशी देखते ही बन रही थी। मानो इन्हें जीवन का परम सुख मिल गया हो। श्वेतांबर साधु-साध्वी भी काफी संख्या में नव मुमुक्षुओं को आशीष दे रहे थे।

> मधुवन में सभी मुमुक्षुओं का वरघोड़ा (वर्षी दान यात्रा) निकाला गया था।

> इनके दर्शन के लिए मधुवन में भीड़ उमड़ी। ये सभी दोनों हाथों से धन-संपत्ति लुटाते हुए चल रहे थे।

> दीक्षा के बाद बदल गए युवतियों के नाम, कहा कि जीवन की पहली परीक्षा हम पास कर गए।

> सभी मुमुक्षु सांसारिक जीवन के इस अंतिम यात्रा में दुल्हा-दुल्हन की तरह रथ पर सवार होकर निकले थे।

> संन्यास लेनेवाली युवतियां गुजरात के सूरत और अहमदाबाद की हैं। जबकि दो व्यक्ति मुंबई के रहनेवाले हैं।

पारसनाथ में जैन साध्वी को आशीष देते गुरुजी।

रास्ते भर जैन साध्वी का हुआ स्वागत।

वर्षीदा यात्रा में शामिल हुईं जैन साध्वी।