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तिनका-तिनका जोड़ बनाया ‘घर’, अब लगा ढहने

7 वर्ष पहले
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सेवाटांड से यात्रा शुरू करने के बाद बाबूलाल ने कड़ी मेहनत से खड़ा किया था संगठन

मरांडी की पुरानी टीम के साथी कहे जानेवाले रवींद्र कुमार राय, दीपक प्रकाश प्रवीण सिंह उनके साथ मिलकर राह दिखाई। राजनीतिक तानाबाना बुना। लेकिन कुछ वर्ष बाद रवींद्र कुमार राय, दीपक प्रकाश सहित अन्य नेताओं ने मरांडी का साथ छोड़ दिया। शु़रुआती दौर में मरांडी का साथ देने वाले प्रो. स्टीफन मरांडी ने भी अलग राह अपना ली।

गठन बिखरने की कहानी

{ विधिवत रूप से 22 मई 2006 को झाविमो का गठन हुआ।

{ मरांडी ने भाजपा सांसद से इस्तीफा देकर 2006 में कोडरमा से उपचुनाव लड़ा, जीते।

{ 2009 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन कर 11 सीटें हासिल की।

{ 2011 में जमशेदपुर उपचुनाव में डाॅ. अजय झाविमो के टिकट पर चुनाव लड़े, जीते।

{ इसके बाद गौतम सागर राणा, डाॅ. दिनेश षाड़ंगी, शैलेंद्र महतो, जोबा मांझी, प्रकाश राम, दुलाल भुईंया, अमित महतो, अजय नाथ शाहदेव स्टीफन पुन: पार्टी से जुड़े

{ लोस चुनाव 2014 में पार्टी ने 14 सीटों पर चुनाव लड़ा। दो सिटिंग सीटें भी नहीं बचा पाए। बाद में छोटे-बड़े नेता पार्टी छोड़ने लगे।

नहीं मिल रहे प्रत्याशी

हिम्मत नहीं हारी

अंदर खाने से रही बातों पर विश्वास करें, तो बाबूलाल मरांडी लाख अकेले चुनाव लड़ने की बात कह लें, लेकिन सच्चाई यह है कि 81 में से 40 सीट पर भी जीतने वाला प्रत्याशी पार्टी के पास नहीं है। ऐसे में दूसरे दलों से गठबंधन करना पार्टी की मजबूरी है।

इसके बाद भी मरांडी ने हिम्मत नहीं हारी। सतत पार्टी गढ़ने में जुटे रहे। नए तेवर के साथ 11 विधायक दो सांसद देकर पार्टी में बूम ला दिया। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से पूरी पार्टी ही दिशाहीन होकर बिखरती जा रही है।

दो नेता माने जा रहे जिम्मेवार

पार्टीमें जमीन से जुड़ा एक-एक कार्यकर्ता इस बात को स्वीकार कर रहा है कि पूरी पार्टी महज दो नेताओं प्रदीप यादव मरांडी के करीबी सुनील तिवारी के कारण बिखर रही है। बाबूलाल केवल इन्हीं दोनों की बातों को महत्व देते हैं। समरेश सिंह शुरू से ही एक व्यक्ति, एक पद की आवाज बुलंद करते रहे। यादव के दो पद का विरोध हो रहा है।