एक अधिकारी के लिए नियमों की अनदेखी
झारखंडएक ऐसा राज्य है, जहां उप सचिव के 209 और संयुक्त सचिव के 135 पद कर दिए गए हैं। सचिवालयों में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए अपर सचिव, संयुक्त सचिव और विशेष सचिव के पदों की संख्या को अप्रत्याशित रूप से बढ़ाने में नियमों और परंपराओं को सरकार में शीर्ष पर बैठे अधिकारियों और पदवर्ग समिति की सहमति से उलट दिया गया। ऐसा करने में राज्य प्रशासनिक सेवा के एक महत्वपूर्ण अधिकारी की प्रभावी भूमिका मानी जा रही है। बीपीएससी 37वें बैच के इस अधिकारी का रैंक लगभग 670 के आसपास है।
फिलहाल राप्रसे के 460 रैंक तक के अधिकारी को संयुक्त सचिव के पद पर प्रोन्नति मिल चुकी है। अगर संयुक्त सचिव के पदों की संख्या नहीं बढ़ाई जाती, तो इस अधिकारी को संयुक्त सचिव के रैंक में प्रोन्नति मिलने में छह से सात साल लग जाते। क्योंकि संयुक्त सचिव स्तर के प्रति वर्ष 25-30 अधिकारियों के सेवानिवृत्त होने पर लगभग इतने ही पदों पर प्रोन्नति होती रही है। अब चूंकि संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों के अधिक पद हो गए हैं, तो उस महत्वपूर्ण अधिकारी को संयुक्त सचिव रैंक में प्रोन्नति मिलने में कम समय लगेगा।
दिलचस्प यह भी रहा कि पदवर्ग समिति में शामिल अधिकारियों ने पदों के चिह्नीकरण में शिक्षा सेवा, सूचना सेवा अन्य सेवाओं के हक मार दिए। जिस अनुपात में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों पर कृपा की गई, दूसरी सेवा के अधिकारियों को पहले से मिले हक भी छीन लिए गए। क्योंकि शिक्षा अन्य सेवाओं के संवर्गीय पदों को भी राज्य प्रशासनिक सेवा के लिए चिह्नित कर दिया गया है।
इससे पहले राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए पदों का बिना सृजन के ही चिह्नीकरण कर दिया गया था। आज भी वे पद विधिवत रूप से सृजित नहीं हैं। इस पर महालेखाकार ने भी सवाल उठाए हैं। लेकिन इसे दूर नहीं किया गया।
अन्य सेवाओं को सबसे अधिक धक्का
एक बड़ा सवाल पद सृजन का
पद सृजन और कर्णांकन के लिए केंद्र में रीस्ट्रक्चरिंग कमेटी है। यह कमेटी आवश्यकतानुरुप पदों का सृजन करती है। किस सेवा में कितने पद होंगे, इसकी सीमा तय करती है। लेकिन राज्य सरकार ने इतने बड़े फैसले लेने से पूर्व रीस्ट्रक्चरिंग कमेटी का गठन ही नहीं किया। इतना ही नहीं, 2003 में बनी देवराय कमेटी और उससे पूर्व प्रशासनिक सुधार के लिए बनी वीएस दुबे कमेटी की अनुशंसाओं को ताक पर रख दिया गया