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वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हैं अभियंता
झारखंडसरकार के पथ निर्माण विभाग में चेक एंड बैलेंस सिस्टम पूरी तरह से फेल है। स्थिति यह है कि कई ऐसे मामले जिसमें कैबिनेट की मंजूरी आवश्यक है, उसको भी दरकिनार कर फैसले लिए जा रहे हैं। ऐसी कई योजनाओं में डीपीआर तैयार करने से लेकर निविदा निस्तारण में अरबों रुपए के लेन-देन का खेल चल रहा है। इसमें कई ऐसे वरीय अभियंता शामिल हैं, जो वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं।
पथ निर्माण विभाग द्वारा ग्रामीण कार्य विभाग के जिन पथों को उखाड़कर तथा उन पर बने पुल-पुलिया, गार्डवाल, नालियां पीसीसी पथों को तोड़कर उनके चौड़ीकरण मजबूतीकरण के नाम पर उसकी लागत कई गुणा बढ़ा दी जा रही है। योजना का डीपीआर और तकनीकी स्वीकृति के लिए विभाग सक्षम प्राधिकार नहीं है। इसके लिए पहले मंत्रिमंडल की मंजूरी जरूरी है। लेकिन कई मामलों में इसका पालन नहीं हुआ।बिना भूमि अधिग्रहण किए डीपीआर तैयार कर तकनीकी स्वीकृति टेंडर निकाला जा रहा है। प्रशासनिक स्वीकृति के बिना भी टेंडर निकाला जा रहा है। इसमें विभाग के दो वरीय अभियंता शामिल हैं, जो विगत सात वर्षों से इसी विभाग में पदस्थापित हैं। ये अभियंता मनमाने ढंग से योजनाओं के निरुपण में बदलाव करने तथा पूर्व में बने पथों को फिर से बनाने के नाम पर सरकार को अरबों रुपए का चूना लगा रहे हैं।
जो भी वरीय अभियंता इस काम में शामिल हैं, उनको पीडब्ल्यूडी रोड के नियम 292 के अनुसार योजनाओं के तकनीकी अनुमोदन, तकनीकी स्वीकृति परिमाण विपत्रों की स्वीकृति के लिए 50 लाख रुपए तक की अधिसीमा तय की गई है। लेकिन 50 लाख से अधिक की राशि की योजनाओं के परिमाण विपत्रों की स्वीकृति वैसे अभियंताओं से कराई जा रही है, जो इसके लिए सक्षम नहीं हैं।