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जब आप चौक-चौराहों या सड़कों से गुजरेंगे तो बहुत सारे युवा कानों में इयरफोन लगाए गीत-संगीत सुनते दिखाई पड़ेंगे। आजकल इस अजीब परंपरा की शुरुआत हुई है कि हमेशा कानों पर इयरफोन लगा रहता है। इस आदत से जहां दुर्घटना होने का खतरा बना रहता है, वहीं छात्रांे का मानसिक संतुलन बिगड़ने का भय भी रहता है। ऐसे में शिक्षकों और अिभभावकों का दाियत्व बनता है कि वह बच्चों को सही दिशा दिखाएं।
कहाजाता है कि प्रेम जाति, धर्म, समुदाय, संस्कृति को नहीं मानता। यहां तक कि प्रेम के लिए सरहदों की दीवारें भी बाधक नहीं होतीं। जब प्रेम ऐसा होता है, तो प्रेम की परिणति विवाह के बाद धर्म कहां से जाता है। प्रेम से दो िदलों का मिलन होता है, धर्मों का नहीं। ऐसे में धर्म के नाम पर होनेवाली प्रताड़ना से ये लोग प्रेम को बदनाम कर रहे हैं। झारखंड की तीरंदाज तारा शाहदेव का मामला देखकर यही लगता है कि अब प्रेम सिर्फ दिखावा रह गया है। रंजीत उर्फ रकीबुल अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रेम का उपयोग कर रहा था। अत: जहां स्वार्थ हो, वहां प्रेम रह ही नहीं सकता। फिर इसका अंजाम ऐसा होना ही था।
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धरती की पुकार
इतना संतोष ठीक नहीं
बच्चों को सही िदशा िदखाएं
जहां स्वार्थ हो, वहां प्रेम नहीं रह सकता