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रुद्र के संघर्ष के बाद आईआईटी में मिला हिंदी को प्रवेश
झारखंड के नेतरहाट विद्यालय के छात्र रहे श्याम रुद्र पाठक ने दिल्ली आईआईटी से 1985 में अच्छे नंबरों से एमटेक तो जरूर किया। लेकिन किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में जाकर लाखों रुपए कमाना गवारा किया। महज इसलिए कि उनसे राष्ट्रभाषा की दुर्दशा देखी नहीं जा रही थी। उनके अंदर हिंदी को उसका वाजिब अधिकार देने का जज्बा आंदोलित था। फिर क्या था उन्होंने अपनी मुहिम शुरू कर दी। 1985 में ही आईआईटी की प्रवेश परीक्षा भारतीय भाषाओं में देने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया। पांच साल तक लगातार धरना-प्रदर्शन करते रहे। उनकी कोशिशों का असर भी हुआ, अंतत: आईआईटी में हिंदी का परचम लहराया। 1990 में भारत सरकार ने हिंदी माध्यम से भी आईआईटी की परीक्षा कराने का फैसला किया। इधर, सी-सैट में उन्हीं के आंदोलन के कारण सरकार ने अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म की। फिलहाल वे सुप्रीम कोर्ट और सिविल सर्विसेस में राष्ट्रभाषा को हक देने के लिए संघर्षरत हैं।
^यह हमारे लिए गर्व की बात है। श्याम रुद्र दूसरे लोगों के लिए भी प्रेरणा बन सकते हैं। हम जिन संस्कारों को छात्रों में डालते हैं, वो विद्यालय से निकलने के बाद भी उनमें कायम है। आचार्यसुरेश कुमार झा, शिक्षक,नेतरहाट विद्यालय
^हिंदी के प्रति मेरे लगाव की शुरुआत नेतरहाट विद्यालय में अध्ययन के दौरान ही हुई। मातृभाषा में बोलने और लिखने की आजादी के बगैर संपूर्ण आजादी नहीं मिल सकती। श्यामरूद्र पाठक, िहंदीप्रेमी
यह सन 1984 की बात है, आईआईटी दिल्ली में पढ़ने के दौरान रुद्र ने बी-टेक अंतिम वर्ष की परियोजना रिपोर्ट हिंदी में जमा की। पर उनकी रिपोर्ट नहीं मानी गई, इनकी डिग्री रोक ली गई। लोकसभा में मामला उठने के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप किया। आखिर इन्हें हिंदी में लिखने की अनुमति तो मिल गई, पर रुद्र यहीं रुके नहीं। उन्होंने इसी समय हिंदी को उसका वाजिब हक दिलाने के लिए संघर्ष करने का निर्णय ले लिया।
सन् 1984 में जीती पहली लड़ाई
इन दिनों में रुद्र संविधान के अनुच्छेद 348 में संशोधन की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ताकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में अंग्रेजी के अलावा हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में भी बहस हो सके। इस मांग को लेकर उन्होंने नई दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय के सामने 225 दिनों तक लगातार धरना दिया था। इसकी वजह से 10 दिनों तक जेल में भी रहना पड़ा