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अफीम पर नारकोटिक्स ब्यूरो की नकेल

7 वर्ष पहले
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रांची. राज्य में अफीम के फैलते काले कारोबार को रोकने में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो प्रयासरत है। ब्यूरो को 12 सितंबर 2014 को उस समय बड़ी सफलता मिली है, जब 2011 में पंडरा से गिरफ्तार दो अफीम तस्करों को 10 साल की सजा सुनाई गई है। झारखंड में अफीम तस्करी के मामले में यह अब तक की सबसे बड़ी सजा है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की टीम ने 18 अक्टूबर 2011 को पंडरा के पास से दो अफीम तस्करों चतरा के प्रकाश कुमार साव और जीतेंद्र कुमार यादव को करीब डेढ़ लाख रुपए मूल्य की 3.5 किलो अफीम के साथ गिरफ्तार किया था।

ठोस कदम उठाए जा रहे

अफीम की खेती करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जा रही है। कोर्ट ने दो अफीम तस्करों को 10 साल की सजा सुनाई है। राज्य के सभी जिलों मे इसकी रोकथाम के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। इसके लिए विशेष अभियान भी चलाया जाएगा। मनीषमोदी, अधिकारीनारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो झारखंड

बहुत कुछ किया जाना है बाकी

हजारीबागऔर चतरा जिले के दो दर्जन से अधिक गांवों में करीब 8 हजार हेक्टेयर भूमि पर अफीम की खेती हो रही है। चतरा जिले के पत्थलगड्डा, गिद्धौर, तेतरिया, नोनगांव, जोरी, बलबलद्वारी आदि दर्जनों गांवों और हजारीबाग जिले के कटकमसांडी, ईचाक, बड़कागांव आदि प्रखंडों के 40 प्रतिशत से अधिक गावों में अफीम नोटों की बरसात कर रही है और माओवादियों की पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है। पोस्ते के बीज की लागत दो सौ से चार सौ रुपए प्रति किलो है। इसकी खेती में सिंचाई की जरूरत है खाद या किसी कृषि उपकरण की।

झारखंड के उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल में पहली बार 2006 में चतरा जिले में अफीम की खेती की शुरुआत हुई। शुरुआती दौर में स्थानीय बाजारों में खपत के अलावा यहां के अफीम के खरीददार भी नेपाली माओवादी ही थे। 40 से 50 हजार रुपए किलो अफीम, एक लाख रुपए किलो ब्राउन शुगर और लाख-डेढ़ लाख रुपए प्रति किलो हेरोइन बेची जाने लगी। इस गैर कानूनी व्यवसाय में लागत की तुलना में मुनाफा हजारों गुना ज़्यादा है। अफीम की पैदावार से नक्सलियों को बतौर लेवी कमीशन मिलने लगा। अफीम की खेती में होने वाले खर्च के साथ-साथ नक्सलियों ने ग्रामीणों को पुलिस से सुरक्षा भी मुहैया कराई।