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देखी जमाने की यारी, बिछड़े सभी बारी-बारी...

6 वर्ष पहले
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गुरुदत्तकी फिल्म है कागज के फूल। कैफी आजमी का लिखा इसका मशहूर गाना है, अरे देखी जमाने की यारी, बिछड़े सभी बारी-बारी। यही हाल बाबूलाल मरांडी और उनकी पार्टी झाविमो का है। गीत के एक-एक बोल इनपर खूब फबते हैं। पहले और आखिरी अंतरे तो बाबूलाल के झाविमो पार्टी के गठन से लेकर अब तक की पूरी स्थिति को बयां करते हैं।

गीत का पहला अंतरा है, मतलब की दुनिया है सारी, बिछड़े सभी बारी-बारी। वहीं गीत के आखिरी अंतरे में झाविमो के अंदर का मौजूदा घटनाक्रम मुखर है। इसके बोल हैं, उड़ जा उड़ जा प्यासे भंवरे, रस ना मिलेगा ख्वारों (कांटों) में। कागज के फूल जहां खिलते हैं, बैठ ना उन गुलजारों में।

बाबूलाल मरांडी ने भाजपा छोड़ने के बाद नई पार्टी बनाई और पहले ही विस चुनाव में 11 विधायक चुनकर आए। कभी किसी ने सोचा भी नहीं था कि पार्टी गठन के दूसरे विधानसभा चुनाव के बाद ही पार्टी की यह दुर्गती होगी विस चुनाव से ठीक पहले पार्टी के नौ विधायकों ने दामन छोड़ दिया। फिर चुनाव हुए तो आठ विधायक जीतकर आए, लेकिन मात्र 44 दिनों के अंदर आठ में से छह विधायक बागी हो गए

कई अच्छे नेता हाशिए पर

संगठनमें कई ऐसे नेता थे, जिन्हें बड़ी जिम्मेवारी दी जा सकती थी, लेकिन उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया। इस मामले पर प्रदीप प्रवीण के बीच कई बार टकराव की स्थिति बनी।

विधायक दल के नेता को लेकर भी था विवाद

चुनावके बाद जब आठ विधायक चुनकर आए, तो विधायक दल के नेता पद को लेकर विवाद हुआ। अधिकांश विधायक प्रदीप यादव को नेता मानने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन मरांडी के दबाव में वही नेता चुने गए।

प्रदीप प्रवीण का अहं टकराया

झाविमोगठन के बाद बाबूलाल ने प्रदीप यादव को पार्टी का प्रधान महासचिव बनाया। वहीं उनसे सीनियर होने के बावजूद प्रवीण सिंह को महासचिव का ही पद दिया गया। शुरुआती दौर में प्रवीण सिंह खामोश जरूर रहे, पर अंदर ही अंदर अहं का बीजारोपण तो हो ही गया। बाद में हर मुद्दे पर यादव का हस्तक्षेप पार्टी के कई नेताओं को नागवार लगने लगा। मरांडी की खामोशी से दूरियां बढ़ती गईं।