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झाविमो और कांग्रेस के आपसी झगड़े ने बिगाड़ा विपक्ष का खेल

6 वर्ष पहले
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झाविमोऔर कांग्रेस के आपसी झगड़े ने विपक्ष की एकता तोड़ दी। जिन बड़े-बड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन करने की घोषणा हुई थी, वह भी धरे के धरे रह गए। तो झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी अपने विधायकों को एकजुट रखने में सफल हुए और ही कांग्रेस के सभी विधायक एक-दूसरे पर भरोसा कायम रख पाए।

वैसे इस बात की भनक झामुमो विधायक दल के नेता हेमंत सोरेन के यहां पांच फरवरी को हुई बैठक में ही लग गयी थी, जब झाविमो और कांग्रेस के अधिकतर विधायक इस बैठक से दूर रहे। वैसे भी विपक्ष की इस छद्म एकता के पीछे सभी पार्टियों की अपनी-अपनी विवशता थी। झामुमो इस बात से खुश था कि उसे विपक्ष के आंदोलन के नेतृत्व करने का अवसर मिल गया, वहीं झाविमो और कांग्रेस इस एकता को अपने विधायकों के विरोध काे दबाने के एक अवसर के रूप में देख रहे थे। झाविमो और कांग्रेस नेतृत्व आत्ममुग्ध था कि वह विपक्षी एकता के बहाने अपने बागी विधायकों को यह समझा सकते हैं कि वे राज्य सरकार को गिरा सरकार बना सकते हैं।

बाबूलाल के नहीं आने पर उठ रहे सवाल

विपक्षीएकता पर अपनी सहमति देने के बावजूद झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी का दोनों महत्वपूर्ण अवसरों पर मौजूद नहीं रहना कई सवालों को जन्म दे गया। पांच फरवरी को प्रदीप यादव ने कहा था कि यह बैठक मरांडी की पहल पर ही हुई है। पार्टी के सभी विधायक एकजुट हैं। पर, राजभवन से लौटने के बाद बाबूलाल और अन्य विधायकों की गैर मौजूदगी पर सवाल पर चुप हो गए