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डाउनलोड करेंरांची/चाईबासा. चाईबासा शहर के बरकंदाज टोली मोहल्ले के कुछ हिस्से को मलिन बस्ती माना गया है। इसी मलिन बस्ती में रहती हैं कुलीन सोच वाली 40 वर्षीय बसंती गोप। गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) रहने वाली बसंती रात्रि पाठशाला चलाकर अब तक 1400 महिलाओं और बच्चों को पढऩा- लिखना सिखा चुकी हैं। इसके अलावा वह अन्य सामाजिक कामों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती हैं।
वे पिछले 17 वर्षों में एक हजार से भी अधिक लावारिस लाशों का दाह संस्कार करा चुकी हैं। इतना ही नहीं उन्होंने अब तक 800 से अधिक गरीब लड़कियों का कन्यादान भी किया है। मोहल्ले के एक कोने में मिट्टी के कच्चे मकान में सेब-मिक्चर बनाकर रोज 150 से 200 रुपए कमाने वाली बसंती गोप न केवल अपने पति सहित पांच बच्चों का भरण- पोषण कर रही हैं, बल्कि पांच अनाथ बच्चों को भी सहारा दे रही हैं। उन्होंने शहर और इसके आसपास के क्षेत्र में अनाथालय बनाने के लिए एक साल पहले ही तत्कालीन उपायुक्त के श्रीनिवासन व तत्कालीन नगर पर्षद की अध्यक्ष गीता बलमुचू को आवेदन दे रखा है, लेकिन अब तक कोई पहल नहीं हो सकी है। बसंती कहती हैं कि यह सब करना उन्हें बहुत सुकून देता है।
समाज सेवा भावना ऐसी कि ठंड होया गर्मी या फिर बरसात। वे रोज पैदल ही 8 से 10 किलोमीटर तक का सफर कर करती हैं। इसके लिए उन्हें सबेरे ही घर का सारा काम- काज निपटा लेना पड़ता है। सदर थाने की महिला हेल्प लाइन व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सदस्य भी हैं।
लिहाजा घर के काम-काज से मुक्ति पाने के बाद सबसे पहले महिला हेल्प लाइन पहुंचती हैं। इसके बाद जहां समस्या दिखी वहां के लिए चल देती हैं। सामाजिक कार्यों को पूरा करने में दिनभर का वक्त निकल जाता है। शाम को घर पहुंचने के बाद वह पति के साथ जुट जाती हैं मिक्चर और सेव बनाने के काम में। सामान के तैयार होते ही उनके पति दिलीप गोप इन्हें बेचने बाजार निकल जाते हैं। इससे जो कमाई होती है उससे घर का सारा खर्च चलता है।
रात्रि पाठशाला से शुरुआत बसंती गोप बताती हैं कि जब वह इंटर में पढ़ रही थीं, उसी दौरान उन्हें लगा कि समाज सेवा जुडऩा चाहिए। लिहाजा, इंटर पास करने के बाद 1996 में उन्होंने जागृति सेवा संस्था का गठन किया। इसके बाद उन्होंने घर के आंगन में ही रात्रि पाठशाला शुरू की। उन्होंने करीब 700 बच्चे व 700 महिलाओं को पढऩा- लिखना सिखाया।
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