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ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ दहाड़ते थे धनंजय महतो

गुरुवार सुबह करीब 11.05 मिनट पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ दहाडऩे वाले स्वतंत्रता सेनानी धनंजय महतो चिर निंद्रा में सो गए।

Dainik Bhaskar

Jan 03, 2014, 03:37 AM IST

चांडिल. गुरुवार सुबह करीब 11.05 मिनट पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ दहाडऩे वाले स्वतंत्रता सेनानी धनंजय महतो चिर निंद्रा में सो गए। उनका निधन नीमडीह प्रखंड अन्तर्गत चांडिल स्टेशन स्थित आवास में हुआ। वे 94 वर्ष के थे। अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव नीमडीह प्रखंड के गुंडा में किया गया।

धनंजय महतो का जन्म गुलाम हिंदुस्तान में आठ अगस्त 1919 को हुआ था। उनकी माता रातुलि देवी और पिता क्षेत्रमोहन महतो थे। पिता पेशे से किसान थे। बचपन से ही मेधावी रहे धनंजय महतो की प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुई। पिता ने उच्च शिक्षा के लिए उन्हें पुरूलिया भेजा, जहां उन्होंने लखनपुर उच्च माध्यमिक विद्यालय में दाखिला लिया।

मृदुभाषी और सहपाठियों से सहृदय रहे धनंजय फिरंगी शासन के काला कानून के खिलाफ दहाडऩे वाले शेर थे। स्कूली जीवन में ही स्वतंत्रता सेनानी भीमचंद्र महतो ने उन्हें देश भक्ति की शिक्षा-दीक्षा दी थी। वे 1935 में 16 वर्ष की आयु में स्वाधीनता संग्राम का हिस्सा बने। अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ तत्कालीन मानभूम जिला के हुड़ा, पोनचा, बांध वान, बड़ाबाजार, पुरूलिया आदि क्षेत्र में देशवासियों के मन में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन छेडऩे के लिए जनजागरण
अभियान चलाया ।

अंग्रेजों के थाने में लगाई आग, गए जेल
1936 अप्रैल में विदेशी सामान के बहिष्कार के लिए पुरूलिया में जुलूस निकालने के क्रम में ब्रिटिश पुलिस ने उनपर लाठी चार्ज किया। इसमें उनके हाथ और सिर में चोट लगी थी। इसके बाद वे दोगुना उत्साह से स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी निभाने लगे। सितंबर 1942 में भीम चन्द्र महतो व धनंजय महतो के नेतृत्व में 19 क्रांतिकारियों के दल ने बड़ा बाजार थाने में आग लगा दी। इस आरोप में धनंजय बाबू पुरूलिया जेल में बंद रहे। 1943 के अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के रामगढ़ में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की अध्यक्षता में आयोजित महाधिवेशन में वे दर्जनों साथियों के साथ पटमदा से रामगढ़ तक पैदल यात्रा करते हुए पहुंचे थे।

एक युग का अंत

नीमडीह के गुंडा गांव के रहने वाले धनंजय महतो ने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बड़ाबाजार थाना जलाने के आरोप में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया था। वे 3 अक्टूबर 1942 से 17 अपै्रल 1943 तक पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जेल में कैद रहे थे। वे 1957 से 1962 तक कांग्रेस के विधायक, 1976 से 1982 तक बिहार विधान पार्षद के सदस्य, 1984 से 1990 तक आयडा के चेयरमैन रहे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे धनंजय महतो के निधन से झारखंड के एक युग का अंत हो गया है।

ये पहुंचे श्रद्धांजलि देने
पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, विधायक अरविंद कुमार सिंह, हिकीम चन्द्र महतो, भाजपा नेता साधुचरण महतो, धरनी सिंह मुंडा, नीमडीह प्रमुख लक्ष्मी सिंह, पूर्व प्रमुख सुबोध गोपाल बनर्जी, जिप सदस्य माधव सिंह मानकी, समाजसेवी सुरेश खेतान, आजसू नेता सत्यनारायण महतो, नीमडीह बीडीओ उदय कुमार, थाना प्रभारी राजीव रंजन आदि।

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