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मोटी कमाई, फिर भी लावारिस सिटी बसें, होती थी 50 लाख रुपए की कमाई

7 वर्ष पहले
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रांची. राजधानी में अर्बन ट्रांसपोर्ट सिस्टम के तहत सिटी बस चलाने के लिए केंद्र सरकार ने काफी पैसे दिए। यह राशि जेएनएनयूआरएम के तहत मिली। लेकिन आज तक ट्रांसपोर्ट सिस्टम सुधर नहीं सका। निगम ने 70 सिटी बसें खरीद कर अपना पल्ला झाड़ लिया। यही नहीं, जितनी बसें खरीदी गईं सरकार उन्हें भी नहीं चला सकी। जेटीडीसी को तीन साल पहले नोडल एजेंसी बनाकर बस चलाने की जिम्मेवारी सौंपी गई थी। लेकिन, उसने बस को हमेशा घाटे में ही दिखाया।

जेटीडीसी ने बस चलाने के लिए भी नायाब तरीका इजाद किया। उसने बस परिचालन का ठेका थर्ड पार्टी को दे दिया। शर्त भी अजीब रखी। बस से कितना भी कमाओ उससे मतलब नहीं, हर दिन फिक्सड राशि कार्यालय में जमा होनी चाहिए। इसकी नतीजा है कि तीन साल में ही सिटी बसें कबाड़ हो गईं। आखिरकार उन्हें बंद करना पड़ा। सिटी बसों की स्थिति और जेटीडीसी के दावों की पड़ताल करने पर पता चला कि सिटी बस से सालाना 50 लाख रुपए की आय थी। लेकिन बसों को घाटे में दिखा कर अधिकारियों ने ही उन्हें बंद करा दिया।
यह है फायदे का गणित
जेटीडीसी ने आस्क सिक्योरिटी को ठेका पर बस चलाने की जिम्मेवारी दे दी। प्रबंधन ने 24 सीटर बस के लिए प्रतिदिन दो हजार रुपए, जबकि 32 सीटर के लिए 2300 रुपए तय कर दिए। बदले में प्रबंधन की ओर से एक बस पर मात्र 100 लीटर डीजल, एक ड्राइवर और एक कंडेक्टर का मानदेय, परमिट और मेजर मरम्मत पर आने वाला खर्च वहन करना था। यानि एक बस पर जेटीडीसी का खर्च लगभग 1900 रुपए पड़ा। इस तरह प्रति बस जेटीडीसी को औसतन 300 रुपए की बचत। साल में यदि 300 दिन भी बसें चलीं, तो जेटीडीसी का मुनाफा लगभग 50 लाख रुपए। वैसे, जेटीडीसी ने एक बस पर 2500 रुपया प्रतिदिन खर्च होने का दावा किया है।
अनुदान मिला, फिर भी सिटी बसें जर्जर
जेटीडीसी की ओर से बसों की मरम्मत, इंश्योरेंस आदि पर बड़ी राशि खर्च करने का दावा किया गया है। लेकिन नगर निगम ने जब बसों की जांच कराई, तो हकीकत सामने आ गई। 60 बसों के टायर पूरी तरह खराब हो गए हैं। किसी भी बस में स्टेपनी नहीं मिली। 58 बसों में बैट्री नहीं थी। जबकि दो बसों का इंजन खराब है। वहीं, एक बस पूरी तरह जली मिली। सभी बसों की बैक और फ्रंट लाइट टूटी मिली। अधिकतर बसों में डेंटिंग और पेंटिंग की जरूरत है। जबकि नगर विकास विभाग ने जेटीडीसी को पूर्व मे 50 लाख और हाल में एक करोड़ रुपए अनुदान के रूप में दिए हैं।
बिहार में बस खरीदने से पहले बनी पूरी व्यवस्था
झारखंड में जेएनएनयूआरएम का फंड लेकर सिटी बसों की फेंका फेंकी हो रही है। वहीं, पड़ोसी राज्य बिहार में बस लेने से पहले उसे चलाने की व्यवस्था कर ली गई है। बिहार सरकार ने बिहार अर्बन ट्रांसपोर्ट सर्विस (बीयूटीएसएल) बना दिया है। यह कंपनी पटना में 260 और गया में 40 सिटी बसों का परिचालन कराएगी। सभी बसों को जीपीएस से जोड़ा गया है। ताकि बस कहां है, उसका पता चल सके। इतना ही नहीं टिकट में घपलेबाजी रोकने के लिए ऑटोमेटिक वेंडिंग मशीन लगाने की व्यवस्था की गई है। सिटी बस चलाने से पहले बिहार सरकार ने स्पेशल पर्पज वीकल (एसपीवी) का गठन कर केंद्र सरकार से फंड मांगा है। झारखंड सरकार ने केंद्र सरकार को दो साल पहले एसपीवी बनाने का भरोसा दिया था। लेकिन आज तक एसपीवी नहीं बना।
ज्यादा है खर्च
एक बस पर प्रतिदिन 2500 रुपए तक मेंटेनेंस खर्च आता है, जबकि इसके एवज में कमाई कम है। यही कारण है कि सिटी बसें शुरू से ही घाटे में हैं। फंड नहीं मिलने के कारण बसों की मरम्मत भी नहीं हो पा रही थी। इसलिए जेटीडीसी बोर्ड ने बस न चलाने का निर्णय लिया।'' सुनील कुमार, एमडी, जेटीडीसी
बड़े सवाल
जेटीडीसी को खर्च से अधिक आमदनी हुई। फिर भी बसों को कैसे घाटे में दिखाया गया। इसकी जांच क्यों नहीं हुई?
एक बस पर प्रतिदिन 2500 रुपए होने का दावा किया है। इसे सच भी मानें तो अनुदान में मिली राशि कहां खर्च हुई?
मरम्मत हुई तो बसें जर्जर, टायर खराब और बैट्री गायब क्यों?